Tuesday, 4 September 2018

चक्रशिला वन्य जीव अभयारण्य

चक्रशिला वन्य जीव अभयारण्य
   जिस दिन पूरी कक्षा ने अनवी को लाल चिड़िया पर हवाई यात्रा करते देखा था उसी दिन से सारे विद्यालय में अनवी की विचित्र  उडान पर चर्चा होने लगी| और धीरे धीरे यह लाल चिड़िया सब के कोतुहल का विषय बन गई थी| अनवी इस को सामान्य महसूस कर रही थी| लाल्चिदिया की सवारी एक हवाई यात्रा की तरह लग रही थी| परन्तु अनवी चिड़िया पर स्वर हो कर कहाँ गई, कैसे रही, वहां पर उसने क्या क्या देखा एक चर्चा का विषय था|इधर अनवी को मायोंग गाँव के दोस्त काफी याद आ रहे थे| उसे देवरी द्वारा बताये दृष्टान्त रह रह कर याद आ रहे थे|उसकी दोस्त एक लाल चिड़िया है या एक शेरनी या फिर रति नाम की एक नव योवना? कई सवाल बार बार उसके मन में उभर उभर कर आ रहे थे|परन्तु कुछ भी हो यह सफ़र काफी मजेदार और रोमांच से भरा हुआ था| अनवी इस बात से बेखबर थी की उसके साथी उससे क्या क्या सवाल पूछेंगे?
    अचानक कक्षा में मैडम ने प्रवेश किया और सभी विद्यार्थियों की उपस्थिति दर्ज करने लगी|जब अनवी का नाम आय तो उसका पेन वहीँ पर रुक गया और मुस्कराते हुए पूछा –अनवी लाल चिड़िया का सफ़र कैसा रहा? वह तुम्हे कहाँ ले गयी|बच्चो से ज्यादा जानने की उत्सुकता मैडम को थी| पूरे दिन अनवी ने बच्चो को अपनी यात्रा का विस्तार से वर्णन किया और उनके सभी प्रशनो के उत्तर दिए| हर तरफ से उठाये सवाल का जबाब बड़ी होशियारी और अताम्विश्वाश  से दिया|पूरा विद्यालय इन रोमांचकारी यात्राओं पर चर्चा कर रहा था| कुछ उसकी बातों पर आसानी से विश्वाश कर रहे थे कुछ थड़े तर्क के बाद विश्वाश कर रहे थे| परन्तु विज्ञानं विषय की मैडम को आज के वैज्ञानिक युग में जादू टोने पर विश्वाश नहीं हो रहा था| और आसानी से मान भी कैसे ले| उसका विज्ञानं उसके सामने आसानी से चकना चूर हो रहा था| उसने अनवी की यात्रा का रहस्य जानने के लिए हर तरह के सवाल किये| अनवी ने होशियारी से सभी सवालों के जबाब दिए|यह कोई मनगढ़ंत कहानी तो थी नहीं जिससे अनवी लडखडा जाए| सत्य तो हर बार सत्य ही होता है|अनवी तो अपने अनुभव ही तो बता रही थी| कई दिनों तक अनवी की यात्रा विद्यालय में एक शोध का विषय बनी रही|
    इस बार विद्यालय में पुनः पांच दिनों की छुट्टियाँ आई| उसकी कक्षा उसकी अगली यात्रा के बारे में जानना चाहती थी| अचानक अनवी ने कहा मेरी अगल यात्रा का बुलावा आ गया है आप लोगों को इस खिड़की में क्या दिखाई डे रहा है|सभी ने खिड़की मे गोर से देखा और बोले खिड़की में तो कुछ नहीं है केवल एक प्यारी सी तितली है| अनवी ने बताया इस बार की मेरी यात्रा की हम सफ़र यह तितली ही है| तितली? यह तितली तुम्हे कैसे यात्रा पर ले जायेगी? इस पर अनवी ने बताया की यह तितली रहस्यमई तितली है| जिस जीव पर यह तितली बीत जाती है वह प्राणी अदृश्य हो जाता है और तितली भी नहीं दिखाइ देती| अनवी के इशारे पर तितली अनवी के ऊपर आ कर बैठ गई | और अनवी सभी के सामने अदृश्य हो गई|सभी बच्चे अपनी कक्षा में अनवी को इधर उधर तलाश कर रहे थे| परन्तु अनवी किसी को भी नहीं दिखाई दे रही थी| एक बार पुनः तितली अनवी के सिर पर से हट गई और अनवी ने सभी को अलविदा कह और अपनी अगली यात्रा पर चल पड़ी| इस बार अनवी केवल अदृश्य हो सकती थी| अतः अदृश्य हो कर पालम एअरपोर्ट से विमान में बैठी आधे घंटे के आरामदायक सफ़र के बाद वह लोकप्रिय गोपीनाथ बारदोई अन्तेर्राष्ट्रिये हवाई अड्डे पर उतरी|इसको गुवाहाटी अन्तेर्राष्ट्रिये वायु अड्डा भी कहते है|पहले इसको बोरझार विमानपत्तनम  भी कहते थे|यह पूर्वोत्तर राज्यों में जाने का एक प्रमुख हवाई अड्डा है| यह दिसपुर से २६ की.मी. दूर बारझोर में स्थित है| यहाँ से स्थानीय बस द्वारा कोकराझार पहुंचे|कोकराझार से ६ की.मी. दूरी पर चक्रशिला वन्यजीव अभ्यारण्य है|यह असम का प्रसिद्ध अभ्यारण्य है|  वन्य जीव पार्क की सैर आपको हमेशा ही प्रकृति के करीब ले जाती है। वन्य जीव पार्क में आप कई प्रकार के वन्यजीवन को देखने का मौका मिलता है।इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं कि, वन्य जीव पार्कों की सैर करना परिवार के साथ एक उपयुक्त जगह है। असम राज्य में कई राष्ट्रीय उद्यान हैं, जहां आप रोमांचक तरीके से अपनी छुट्टियों को बिता सकते हैं। असम में कई सारे नेशनल पार्क है, जो यहां आने वाले पर्यटकों की सभी सुविधायों का ध्यान रखते हुए उनकी छुट्टियों को रोमांचक बनाते हैं| यहाँ पर अभ्यारण्य के आलावा हनुमान मंदिर कोकराझार और काली मंदिर कोकराझार देखने लायक है|यह अभ्यारण्य लगभग ४५कि.मी. में फैला हुआ है| यह मुख्य रूप से पहाड़ी क्षेत्र में फैला हुआ है|इसमें दो प्रसिद्द झील है जिनको धीर बीक और दिप्लाई बील के नाम से जाना जाता है|यहाँ पर साल का पेड़ प्रमुख रूप से पाए जाते है| हिन्दू मान्यताओं के अनुसार यह पेड़ भगवन विषाणु का प्रिय पेड़ है|शाल संस्कृत का शब्द है| जिसका अर्थ घर होता है| यह मुख्य रूप से घर बनाने के काम आता है | जैन धर्मं के २४वे तीर्थंकर भगवान महावीर को साल के पेड़ के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ था| बौध मान्यताओं के अनुसार गौतम बुद्ध की माँ रानी माया देवी ने साल के पेड़ के नीचे ही गौतम बुद्ध को जन्म दिया था| गौतम बुद्ध को साल के पेड़ के नीचे ही निर्वाण प्राप्त हुआ था| इसलिए यह यह अभ्यारण्य बौध भिक्षुओं को काफी आकृषित करता आ रहा है|
    चक्रशिला वन्य प्राणी अभ्यारण्य में विभिन्न प्रकार के मादा,पक्षी और सृरिसृप की २३ प्रजातियाँ  पाई जाती है| यहाँ पर तितलियों की चालीस से ज्यादा प्रजातियाँपाई जाती है| यहाँ पर छोटी पूंछ के moleमोल, भारतीय उड़ने वाली लोम्बड़ी,छोटे नाक वाली चमगादड़ पक्षियों की लगभग ११९ प्रजातियाँ पपी जाती है|जिन में काला तीतर,बटेर,गाय बगुला,बैगनी बगुला, mole लाल सर का गीध  प्रमुख है| अनवी उस तितली के साथ साल्कोचा गाँव पहुंची|यहाँ का बुढा-बूढी मंदिर काफी प्रसिध है|प्रति वर्ष यहाँ अप्रैल माह में मेला लगता है और बुढा-बूढी की पूजा की जाती है| इसके नजदीक ही अन्नपूर्णा मंदिर है| अन्नपूर्णा मंदिर में बुढा-बूढी की पूजा से एक दिन पहले पूजा की जाती है| साल्कोचा गाँव के दक्षिण में ब्रह्मपुत्र नदी के तट पर चंदर दीघा पहर पर पगला बाबा का मंदिर है| यह मंदिर भगवान भोले नाथ का मंदिर है|दीप्लाई बील झील पक्षी बिहार के लिए काफी उपयुक्त है|इस झील में प्रवासी पक्षी आते हैं|पश्च्स्मी किनारे पर बोरो,रावा और गारो समुदाय के लोग रहते है|यहीं पर मेरा प्रिये बंदर जो छ इंच का है, रहता है| मूल रूप से इनको सुनहरे लंगूर के नाम से जाना जाता है| यहाँ पर ये सामान्य आकार में पाये जाते है|
    सालाकोचा गाँव के पूर्व में धीर बील झील है| यहाँ पर टीन्टला,धीर घाट और डकरा  बील झीलों में विभिन्न प्रजातियों की मच्छलिया पाई जाती है| मेरी दोस्त लाल मच्छली इसी प्रजाति की है| ब्रह्मपुत्र नदी के उत्तरी तट पर दूध नाथ मन्दिर है|जो भगवान शिव का मंदिर है|यह मंदिर तिलपाडा नामक जगह पर है|यहाँ  श्रावण मास की शिवरात्रि को भरी मेला लगता है| सालाकोचा के उत्तरी भाग में एक झरना है जिसको हवाई झोरा कहते है| यह जगह शांत और शीतल है|और तंत्र साधना के लिए प्रसिद्ध है|
    यहाँ आने पर अनवी की दोस्त तितली की कई दोस्त उससे मिली|उनमें से एक तितली बोली में पहले एक लड़की थी| यहाँ के बूढा-बूढी मंदिर में हर साल आती थी| एक दिन में चन्द्रदीघा पहाड़ पर पगला बाबा के मंदिर चली गई|में उसे पागल समझ कर चिढाती रही| में नहीं जानती थी की यह भगवान भोले बाबा का मंदिर है|सब इसको पगला बाबा का मंदिर के नाम से जानते है| इस मंदिर में कोई तांत्रिक आया हुआ था|वह अपनी साधना में लीन था| मेरी हंसी से उसकी साधना में भंग पडा और उसने अपनी तंत्र विद्या के बल पर मुझे तितली बना दिया|मैंने भगवान् आशुतोष का बहुत जाप किया और तांत्रिक से क्षमा भी मांगी| इस पर तांत्रिक ने बताया क जब कोई तुम्हारे नाम से दूध नाथ मन्दिर में श्रावण मास की शिवरात्रि को दूध चढ़ाएगा तो तुम पुनः मानव योनी में आ जाओगी|  मेरी सहेली तितली जिसको हम प्यार से तितों कहते है मुझे इसी कार्य के लिए लेकर आई है| अनवी ने साड़ी बाते ध्यान से सुनी और उनके बताये नियमानुसार हवाई झोरा जल प्रपात में स्नान किया और पास के दूकान से दूध ला कर दूध नाथ मंदिर में दूध चढ़ाया|इसके तुरंत बाद वह तितली पुनः एक सुंदर लड़की बन गई|शिव कृपा से पुनः मानव योनी मिली इसलिए उसने अपना नाम शिबंगी रख लिया| अब अनवी, शिबाँगी और लाल तितली मंदिर प्रांगण में ही रहने लगी| शिबांगी को एक युवक से बिहू के अवसर पर एक युवक से प्यार हो गया और दोनों ने शादी करना तय कर लिया था|मेरी छुट्टियाँ ख़तम होने को थी|अतः मैंने अपनी यात्रा को स्थगित कर पुनः लाल तितली के साथ अपने विद्यालय आ गई| शिबाँगी ने अपनी शादी में आने का निमंत्रण पहले ही डे दिया था|
    निश्चित समय पर अनवी शिवांगी की शादी में पहुँच गई थी| उसके पास असमियां शादी के रीती रिवाज समझने का काफी समय था|शिबंगी ने बताया:- आसाम के बोंगाई गाँव जिले में लड़की जब पहली बार रजस्वला होती है तो उसकी पहली शादी पेड़ से करवाते है|केले के पेड़ के साथ लड़की की शादी एक अजीब परम्परा है|इस शादी को तोलिनी विवाह कहते है|इस दौरान लड़की को सूर्य की किरणों से बचा कर रखा जाता है|शादी के दौरान लड़की को केवल फल और कच्चा दूध दिया जाता है|तोलिनी ब्याह को पहली शादी भ कहते है| सही उम्र पर लड़कियों की शादी कर दी जाती है|हिन्दू मान्यताओं के अनुसार जब वर्ष नहीं होती तो इंद्र देवता को खुश करने के लिए यज्ञ हवन आदि किया जाता है|परन्तु जब असम में वर्षा नहीं होती तो मेंढकों की शादी करवाई जाती है|
    असम में शादी की कुछ रश्में निम्न लिखित है- शादी से पूर्व की रश्में
·        जुरान दिया –यह शादी से इ या दो दिन पहले किया जाने वाली रश्म है|
·        तेल दिया-इसमें दुल्हे की माँ अपनी होने वाली बहु को अंगूठी और सुपारी भेंट करती है| और बालों में कंघी करती है|
असामी लोगों में शादी की रश्मों को बिया कहा जाता है| असामी शादी सामुदायिक रीती-रिवाजों की एक मिसाल है|जो बहुत ही साधारण तरीके से की जाती है|शादी का पूरा समारोह दो से तीन दिन तक चलता है| पहले दिन बिया नाम या बिया गीत के नाम होता है| जहाँ महिलाये शादी के गीत गाती है|पुरे शादी समारोह में कौंच और उरुली बजाई जाती है|महिलाओ द्वारा जीभ से एक विशेष आवाज निकली जाती है|जुरान दिया में सभी घरों में आम के पत्तों की बंदरवार बना कर दरवाजों पर लटकाई जाती है|यह बंदरवार बुरी आत्माओ को दूर रखती है|इसको असामी में दली गाथा कहते है|इस दिन दुल्हे की अन्य औरतों के साथ दुल्हन के घर जाती है और शादी की अनेकों रश्मे पूरी करती है|एक ताम्बे की प्लेट में पान और ताम्बुल(सुपारी) एक गमछे से धक् कर देती है|दुल्हन को अन्य औरतें पकड़ कर शादी के पांडाल में ले कर आती है|दुल्हन अपन सर ढक कर आती है|दुल्हे की माँ द्वारा लाये उपहार उसे भेंट किये जाते है| तेल दिया में इसमें दुल्हे की माँ अपनी होने वाली बहु को अंगूठी और सुपारी भेंट करती है| और बालों में मांग निकालती है|अपने साथ लाया तेल दुल्हन के बालों में तीन बार लगाती है| इसके बाद सास द्वारा मांग में सिन्दूर भरा जाता है| शेष भारत में दूल्हा मांग भरता है|इस राशम के बाद दुल्हन हमेशा अपनी मांग में सिन्दूर भारती है|यहाँ की शादी के पारम्परिक परिधान होते है|दूल्हा  धोती कुर्ता और चेलांग ( एक प्रकार का शाल) पहनता है| यह विशेष रूप से मूंगा सिल्क का बना होता है| फूलों की माला के साथ वह तुलसी के पत्तों की माला भी पहनता है| दुल्हन के परिधान में मेखला चद्दर जो मूंगा सिल्क की बनी होती है|एक भाग साडी और दूसरा ब्लाउज की तरह पहना जाता है|सोने के गहने(जुन बिरी) पहनने का रिवाज है|
पानी तुला:-इस समारोह में दूल्हा और दुल्हन की माँ नजदीक के तालाब या नदी पर जाती है और वहां से पानी भर कर लाती है| इस पानी से शादी के लिए स्नान किया जाता है|दोनों पक्ष चावल के ढेर पर जलता हुआ दीपक रखते है|इसके साथ सुपारी का जोड़ा , चाक़ू ,सिक्का और ताम्बुल के पत्ते होते है|गीत गाती औरतें नदी या तालाब से पानी लाती है| पानी का पात्र घर पर रख कर बिना मुड़े और पीछे देखे नदी पर जाया जाता है| सिक्का दूल्हा/दुहन को दे दिया जाता है|चाक़ू को दुल्हे के गम्च्छे से बाँध दिया जाता है| यह चाक़ू बुरी आत्माओं को दूर रखता है|काला जादू से बचा कर रखता है|
दाइयां दिया :-दूल्हा पक्ष प्रातः काल दुल्हन के घर दही भेजता है| इसमें से आधा दही दुल्हन खाती  है| शेष आधा वापिस दुल्हे के पास भेज दिया जाता है|
नौ पुरुशौर शरदो :-इस रश्म में दोनों परिवारों के पूर्वजों को श्रधांजलि  अर्पित की जाती है| यह रश्म प्रायः दूल्हा और दुल्हन के पिता  करते है| अपने पूर्वजो की  पिछली नौ पीढ़ियों अभय दान मांगते है|
नौनी (स्नान समारोह) में दूल्हा और दुल्हन नदी से लाये जल से स्नान करते है| पहले माँ तेल और दही लगाती है|इसके बाद उड़द की दाल और हल्दी का लेप लगाया जाता है और इसके बाद शेष औरतें इसमें भाग लेती है| इसके बाद नदी जल से स्नानं करा जाता है|
स्वागत:-स्वागत समरोह में दुल्हन को समारोह में बने विशेष मंच पर बैठाया जाता है|वह अपने अभिन्न मित्रों और रिश्तेदारों का स्वागत सौफ डे कर करती है| दुल्हे के पहुँचने पर दुल्हन को अन्दर ले जाया जाता है|दुल्हन पक्ष की और से दी गयी पोषक में दूल्हा समारोह स्थल पर आता है|वह सर्वप्रथम अपनी माँ से आशीर्वाद प्राप्त करता है| माँ इसके बाद आगे की शादी की रश्मे माँ नहीं देखेगी एसी प्रथा है|आशीर्वाद देने के बाद वह जलूस के साथ वापिस घर लौट जाती है| इसके बाद दुल्हन का परिवार विभिन्न रश्मों में भाग लेता है|
डोरा आहा :-जब बारात दुल्हन के घर पहुंचती है तो उन्हें एक रश्म अदा करनी पड़ती है|यहाँ काफी हास्य विनोद होता है| एक रकम अदा करने पर बारात को घर में प्रवेश करने की इजाजत मिल जाती है|
भोरी धुवा :- दुल्हन की माँ आरते की थाली के साथ स्वागत कर्ट है और साली दुल्हे के पैर धोती है|इसके बाद दुल्हे को जमीन पर पैर रखने की इजाजत नहीं है|उसके साले उसे उठा कर समारोह स्थल में ले जाते है| दुलहन को पंचामृत  (दही, घी,शहद,मीठा और कच्चे दूध का मिश्रण) दिया जाता है|
बिया- दुहां को उसके मामा अपने कन्धों पर उठा कर समारोह स्थल पर लाते है| पवित्र अग्नि के समक्ष शादी संपन्न होती है| सप्तपदी रश्म के साथ शादी सम्पन्न होती है|अंत में  दुल्हन ताम्बुल के सात पत्तों पर अपना दाहिना पैर रखती है|
शादी की उत्तरोतर रश्में:- खेल धमाली में नव दम्पति शादी के पारंपरिक खेलों में भाग लेते है|
मान धोरा:-नवयुगल बड़े बूढों का आशीर्वाद लेते है और बदले में उनसे उपहार देते है|बिदाई समारोह में आश्रुपूर्ण बिदाई होती है|दुहां के ऊपर चावल फेंके जाते है ताकि माँ बाप के ऋण से मुक्त हो सके| नव दम्पति शादी के बाद घर पहुँचने पर उसकी माँ उनका स्वागत करती है इसको घोर मोसोका कहते है| दुल्हन थाली में रखे दूध में कदम रखती हुई आगे बढती है|मिटटी के दीये तोड़ती हुई घर में प्रवेश करती है| कुछ सामान्य सी रस्में पूरी करने के बाद दुल्हन वापिस अपने पिता के घर पहुंचती है| अगली सुबह दूल्हा अपनी ससुराल में आता हैऔर पुरोहित से खुबा खूबी की कहानी सुनते है| अपने देवताओ का आशर्वाद पा कर अपने घर पहुँचते है| वहां पर फूल सोजा और अस्टमगाला की रश्में होती है|अनवी शादी का आरम्भा से अंत तक का विवरण सुन कर थक cथी| शिबंगी ने बताया की हमारी शादी में प्रेत आत्माओं से बचने के लिए काफी रश्म और रिवाज किये जाते है|
    शिबाँगी बताती है:-मेरे पड़ोस में एक अम्मा अपने पति के साथ रहती थी उनके एक लड़का भी था|भरी वर्षा में उनका मकान बह गया|दोनो अपने बच्चे के साथ मुसीबत में फस गए | भरी वर्षा बाढ़ का रूप धारण कर चुकी थी|अंत में उन्होंने दूध नाथ मंदिर में शरण लेने की सोची| दोनो बच्चे के साथ आगे बढ़ रहे थे उनके रास्ते में हवाई झोरा नाम का झरना आया  इसे पार करते समय तीनो पानी में बह गए| यह जगह तंत्र विद्या के लिए प्रसिध है|लड़का नदी के दूसरे किनारे पर और उसकी माँ दुसरे किनारे पर दूर जा कर पानी से बाहर निकले| आदमी सालकोचा गाँव के पूर्व में स्थित धीर बील के किनारे पहुच गया| तीनो को एक दूसरे की कोई जानकारी नहीं थी|हालात से परेसान आदमी दर दर की ठोकरें खाता रहा  परन्तु अपने परिवार की कोई खबर नहीं थी| हार परेसान आदमी पगले बाबा के मंदिर पहुंचा| वहा भगवन आशुतोष की पूजा अर्चना की| उधर वह लड़का शिवांगी के हर के बाहर पहुँच कर रोने लगा | शिवांगी के घर पर उसे खाने पीने को दिया गया और उसको पुत्रवत पाला गया | आदमी विगत पांच वर्षों से अपनी पतनी और लड़के को तलाश कर रहा था| अंत मे  वह मंदिर से हवाई झरने के पास पहुंचा|वहां पास ही एक झोपड़ी में एक औरत धान  सुखा रही थी|वह उस औरत के पास गया और अपनी व्यथा कथा कह सुनाइ और उससे खाने को कूचा माँगा |उसने झोपड़ी में झांक कर देखा तो एक दूसरी औरत खाना पका रही थी| उसने चूल्हे में लकड़ की जगह पर अपना पैर लगाया हुआ था|उसने उस बूढी औरत से जानना चाहा की इसका क्या रहस्य है? इतना पूछते ही वह बेहोश हो गया और होश आने पर अपने आप को दिपलाई झील के पास पाया |अब उसको यकीं हो गया था की वह औरत उसकी पत्नी और लड़के के बारे में अवश्य जानती है| परन्तु वह उसके जादू के प्रभाव को पहले ही समझ चुका था|वहीँ झील के किनारे एक साल के पेड़ के नीचे एक अघोरी बाबा साधना में लीन था|वह उस बाबा की शरण में चला गया| बाबा की सेवा करने लगा| श्रावण मास के अंत में अघोरी की साधना सफल हुई|बाबा उस आदमी की सेवा से काफी खुश था| एक दिन बाबा ने उसका हालचाल जाना और वह कैसे परेसान है जाना| अघोरी उसकी मनोव्यथा को समझ चुका था| उसने उस आदमी से एक कच्चा नारियल मंगवाया और उसको सावधानी से ऊपर से काटा | नारियल में पानी भरा हुआ था| नारियल के पानी को अभिमंत्रित किया और उसमें अपनी धूनी की राख की एक चुटकी डाली | अब नारियल के पानी में प्रीतिबिम्ब दिखाई देने लगा | उससे अघोरी ने बताया की उसकी पत्नी कैसे उस बुढिया के जाल में फसी हुई है| वह बुढिया उसको अपने बेटे की बहु बनाना चाहती है|परन्तु वह इस काम के लिए मना कर रही है| इसलिए उसको यातना झेलनी पड़ रही है|प्रतिदिन उसका पैर जलाती है और मन्त्रों द्वारा पुनः ठीक कर देती है|अघोरी के कहे अनुसार वह आदमी राख की पुडिया लेकर उस बुढिया की झ्पदी के पास गया और उचित अवसर पा कर वह राख अपनी पत्नी पर दाल दी| शेष राख अपने ऊपर दाल ली | इससे बुढिया के जादू का कोई असर नहीं हुआ और अपनी पत्नी को ले कर  पुनः अघोरी बाबा के पास आ गया |अघोरी ने बताया की उनका लड़का शिबांगी के पास सकुशल है| वह उसका अपने बेटे की तरह लालन-पालन कर रही है| तुम वहां जाओ शिबांगी तुम्हारा इन्तजार कर रही है| थोड़ी देर में वह दम्पति वहां पहुँच गया| इस पर अनवी ने पूछा उम्हे कैसे पता चला की वे लोग यहाँ आ रहे है| इस पर शिबांगी ने बताया की  हम अपनी तंत्र विद्या से अपने संपर्क सूत्रों से सम्बंध बनाए रखते है| हम नारियल के पानी या थाली में पानी डाल कर उसको अभिमंत्रित करके प्रीतिबिम्ब में हालचाल जान सकते है|जिससे हमारा संपर्क नहीं होता उसको तलाश करना मुस्किल होता है| यह ठीक वैसे ही है जैसे मोबाइल नंबर के बिना बात नहीं हो सकती| शिबांगी ने बच्चा उनके हवाले किया| अनवी ने पुछ इन के साथ ये घटना क्यों घटी? उसने पानी में झाँक कर बताया की इन दोनों ने अपनी शादी में नौ पुरुशौर शरदो रश्म नहीं की| इस रश्म में अपने नौ पीढ़ियों तक के पूर्वजों से अभयदान माँगना होता है|उनको शर्द्धांजलि देनी होती है| आप लोग पगला बाबा के मदिर जाओ और वहीँ पर यह रश्म पूरा करो |

    अनवी शादी समारोह में पूरी तरह व्यस्त रही| फुरसत के समय में अभ्यारण्य में घूमी और वन्य प्राणियों के बारे में जाना| दिल छह रहा था की कुछ समय और बिताया जाए परन्तु छुट्टियाँ खत्म हो रही थी| अनवी अपनी कक्षा में आई तो उसके साथी मनोरंजक और रहस्यमई यात्राओं का मजा ले रहे थे| कुछ बच्चे अनवी की बातों को मनगढ़ंत समझ रहे थे| अनवी ने बताया की आप लोगों ने मुझे जाते हुए देखा है| अपने किसी परिचित से जो असम में रहता हो इन तथ्यों की पड़ताल कर सकता है|

Monday, 3 September 2018

पोबित्तरो वन्य जीव अभ्यारण्य

   

                                                      पोबित्तरो वन्य जीव अभ्यारण्य



    दो घंटे के सफ़र के बाद अनवी माया नगरी माँयोंग पहुंची|पोबित्तरो वन्य जीव अभ्यारण्य के गैंडे और अन्य हिंसक जानवर इस गाँव में देखने को मिल जाते है| जंगल से घिरे इस गाँव में पहुंचते ही एक अनछुए रहस्मयी स्थान पर पर पहुँचाने का आभाश होने लगता है|इस स्थान के पारम्परिक महत्व का पता इसी तथ्य से लगता है कि इसे देश की जादू-टोने की राजधानी माना जाता है। इस गांव की यात्रा कुछ ऐसे दुर्लभ तरीकों को देखने का अवसर दे सकती है जो आधुनिक जगत को अप्राकृतिक लग सकते हैं परंतु ये किसी को भी हिला देने में सक्षम हैं।गांव में एक अनूठा उत्सव मायोंग-पोबित्र भी आयोजित किया जाता है जिसे जादू तथा वन्य जीवन के संगम के रूप में मनाया जाता है।दिलचस्प है कि यहां रहने वालों को नहीं पता है कि यह स्थान जादू-टोने के लिए किस तरह से इतना लोकप्रिय हो गया अथवा यहां जादू-टोने का अभ्यास करने वाला पहला व्यक्ति कौन था? फिर भी अन्य विधाओं की ही तरह इस गांव में जादू-टोने की कलातथा हुनरएक पीढ़ी से दूसरी को मिलता रहा है।
    लाल चिड़िया ने अनवी को मायोंग गाँव के नज़दीक अभ्यारण्य में एक झोपड़ी के पास पहुँचाया|वहां पहुंचते ही लाल चिड़िया ने अपने सामान्य आकर में आकर अपनी एक सहेली को आवाज़ लगाई| युवती आवाज़ के साथ ही झोपड़ी से बाहर आ गई  और उनका दिल से स्वागत किया|लाल चिड़िया ने अपनी सहेली का परिचय करवाया |उसकी सहेली का नाम देवरी था| देवरी बिहू नृत्य की एक किस्म का नाम है|बिहू नृत्य के कई प्रकार हैं| उदाहरण के लिए "देवरी बिहु नृत्य", "माइजिंग बिहु नृत्य" रति बिहू इत्यादि| हालाँकि नृत्य का मूल लक्ष्य एक ही रहता है| दर्द और खुशी दोनों को महसूस करने की इच्छा व्यक्त करना।इस नृत्य शैली पर ही लाल चिड़िया की सहेली का नाम रखा गया था|

    देवरी  आकर्षक व्यक्तित्व की सुंदरी थी| बिहू नृत्य के दौरान ही उसने अपनी पसंद के युवक से शादी कर ली थी| मायोंग गाँव में रह कर देवरी ने जादू सीख लिया था| उसने पानी को अभिमंत्रित कर के लाल चिड़िया पर छींटे मारे इस से लाल चिड़िया एक सुंदर युवती में परिवर्तित हो गयी|वह काला जादू के प्रभाव से ही लाल चिड़िया बनी हुई थी|लाल चिड़िया से युवती बनी लड़की का नाम रति था| अब देवरी रति और अनवी में अच्छी दोस्ती हो गई थी|अनवी ने पूछा यह सब आपने कब और कैसे सीखा ? इस तरफ आप का झुकाव कैसे हुआ?

    देवरी बताने लगी मैंने बिहू नृत्य के दौरान लड़का पसंद किया था और इसके बाद शादी कर ली थी| मेरा पति काफी सुंदर और स्वभाव का अच्छा था| हमारी एक पड़ोसिन  ने मेरे पति को  काला जादू से मेंढा बना कर अपने घर बाँध लिया| मुझे इसकी जानकारी नहीं थी| में कई सालों तक अपने पति को तलाश  करती रही परन्तु सफलता नहीं मिली| में अपनी एक भैंस के साथ खेतों में काम करती रही और अपना गुजरा करने  लगी|खेतों में चावल और पास के तालाब में मच्छली हो जाती थी|निचले असम के कुछ हिस्सों में जाली मौसम (धान की खेती का सबसे व्यस्त मौसम जो जून में शुरू होता है और दिसंबर में खत्म होता है) के दौरान, यहां का लगभग हर किसान एक विशेष प्रकार का स्वदेशी चावल पर ज़ोर देता है। जिन्हें बोका साल या 'मिट्टी चावल' के नाम से जाना जाता है। यहां के किसानों को इस चावल के बारे में पता है। बता दें कि इस चावल को हाल ही में बौद्धिक संपदा भारत (आईपीआई) द्वारा भौगोलिक संकेत (जी आई) टैग मिला है।बोका साल को निचले असम के नलबारी, बारपेटा, गोल पारा, काम रूप, धरांग, धुबरी, चिरांग, बोंगाईगांव, कोकराझार, बक्का आदि स्थानों पर उगाया जाता है।यह खेतों में अपना खून पसीना बहाने वाले सैकड़ों किसानों के लिए ईंधन है और उनका मुख्य खाद्य पदार्थ है। 
    बस इसी दिनचर्या से गुजारा होने लगा|सुबह और सांयकाल घर के बाहर ताम्बुल(सुपारी) और शराब बेच कर अपना  गुजारा करने लगी| असम के लोग शराब को अलग-अलग विधा से तैयार करते हैं और यहां कई क्वालिटी की शराब मिलती हैं| असम में शराब निषिद्ध नहीं है और लोग अपने-अपने घरों में भी शराब बनाते हैं| जतिंगा  भारत के पूर्वोत्तर राज्य असम घाटी में एक गांव है। यह  गुवाहाटी के दक्षिण में 330 कि.मी. दूरी पर स्थित है। यह गांव  पक्षियों के सामूहिक रूप एवं  गोपनीयता आत्महत्या के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है| मानसून के अंत में, विशेष रूप से चंद्रमा ना होने पर पक्षी कोहरे भरी रात काली रातों  में शाम 6 बजे से रात 9:30 बजे  तक के बीच में परेशान हो कर प्रकाश की और जाते हैं। इस समय वह मदहोशी में होते हैं  और चारों ओर पेड़ के साथ टकरा कर मर जाते हैं।  इस  घाटी में चुंबकीय शक्ति  अचानक बदलने  लगती है जिसकी वजह से पक्षी साधारण से अलग व्यवहार  करते हैं| 
    उसके पति देबोग को मेढा बना कर पड़ोसन ने बाँध लिया था| रात्रि में पुरुष बना कर घर में रख लेती थी|और सुबह पुनः मेंढा बना देती थी|देवरी ने दस साल तक अपने पति को ढूंढा परन्तु सफलता नहीं मिली| अंत में वह एक अघोरी बाबा के पास गई|उसको अपनी समस्या बताई | बाबा ने अपनी सिद्धियों के प्रताप से बताया की उस का पति उसके सामने वाली पड़ोसन के घर में है| उसने उसको मेंढा बना कर रख हुआ है| उसने बताया उसके पति कान में बाली पहनते थे| इस पर देवरी ने बताया की हाँ, परन्तु वह तो केवल बायें कान में ही पहनते थे | अघोरी ने बताया  की उस मेंढे के भी बाएँ कान में ही बाली है| काला जादू से बाली का स्वरूप या रंग नहीं बदलता| वह अपने वास्तविक रूप में ही रहती है|आरम्भ में तो देबोंग उस से पीछा छुड़ा कर तुम्हारे पास आना चाहता था है| परन्तु अब उसको उस पड़ोसन से ही प्यार हो गया है| अब वह दिन में आदमी बना रहे तो भी तुम्हारे पास नहीं आएगा|यह सुन कर देवरी को काफी अफसोस हुआ|  इसके बाद देवरी ने बताया की मायोंग गाँव के एक हिस्से को बुढा माँयोंग कहते है| दूर से देखने पर ये इलाक़ा भी देश के किसी दूसरे गांव की तरह ही है| लेकिन जैसे-जैसे गांव की ओर बढ़ेगे, धड़कनें तेज़ होने लगाती है| गांव में घुसते ही एक अजीब सी जगह दिखाई देती है| ये वही जगह है, जहां तांत्रिक, तंत्र साधना करते हैं| इलाके के लोग इसे बूढ़ा मायोंग भी कहते हैं| यहां मौजूद अजीबोगरीब चीज सब  को हैरत में डाल देती है| और मायोंग के एक तांत्रिक बताया कि ये वही जगह है, जहां हर 100 साल में एक बार नर बलि दी जाती है| इस शख्स के दावे को जांच ने को में  आगे बढ़ी | वाकई यहां दो कबूतर मौजूद थे|. इतने शोर-गुल के बाद भी कबूतर यहां से नहीं भागे| लोगों का दावा है कि हर रोज़ दो कबूतर यहां अपने आप आते हैं और बलि को कबूल करते हैं|
 देवरी ने थोड़ा रास्ता  और तय किया तो पहाड़ों की चट्टानों पर भगवान की प्रतिमाएं मिलीं| जिसमें से कुछ भगवान गणेश की थीं| और  कुछ भगवान शंकर और मां पार्वती की| इलाके के तांत्रिकों ने देवरी  को एक योनि कुंड दिखाया| देवरी  को बताया गया कि इस कुंड में भी तांत्रिक साधना किया करते थे| जिसके पास कुछ अजीबोगरीब मंत्र लिखे हुए हैं और दावा किया जाता है कि मंत्रों की शक्ति की बदौलत ही इस कुंड में पानी हमेशा मौजूद रहता है, जो गर्मी के मौसम में भी नहीं सूखता|
   बूढ़े मायोंग के लोग इतने सिद्धहस्त है की आदमी को ग़ायब कर देते है या फिर उसको जानवर बना देते है|अपनी सम्मोहन शक्ति से जंगली जानवरों को पालतू पशु की तरह बना कर घर के बाहर बांध देते है| अघोरी बाबा से कठिन साधना के बाद उसने भी काला जादू सिखा है|काला जादू के प्रभाव से मैने पड़ोसन और अपने पति को पक्षी बनाया और जतिंगा के पेड़ो से टकरा कर दोनों की मार दिया| इसके बाद मैने एक आदमी को सम्मोहित कर के अपने घर रखा जो मेरे खेत और तालाब पर काम करता था|साप्ताहिक बाजार में सामान बेच और ख़रीद कर लाता था|दस साल तक वह मेरे पास रहा और उसको घर की हर सुविधा और सुख दिया ताकि वह यहीं पर ही रहने लगे| परन्तु में दस साल की अवधि में भी उस का मन नहीं जीत सकी| इस के बाद मैने उसको काला जादू से मुक्त कर दिया| इसके बाद जब वह अपने घर गया तो उसकी पत्नी और बच्चे ने उसे स्वीकार नहीं किया|
    रति भी मुझे पबित्रो वन्य जीव प्राणी अभ्यारण्य में मुझे घायल अवस्था में मिली थी|असल में यह एक शेरनी है| जादू से इसे लड़की बनाया हुआ है| रति ने बताया की तीन शेरों में  अपना अपना अधिपत्य ज़माने के लिए भयंकर लड़ाई हुई| इस लड़ाई में दो शेर तो वहीँ मारे गए और तीसरा घायल हो कर गिर गया| इस लड़ाई में मै भी गंभीर रूप से घायल हो गई| देवरी ने बताया की में घायल शेरनी को उठाकर घर नहीं ला सकती थी | इसको लाल चिड़िया बना कर अपने घर ले आई|लम्बे इलाज के बाद यह स्वस्थ्य हो गई| काफी समय साथ रहने के कारण हम दोनों में प्यार हो गया|मैंने काफी बार इसको कहा चलो मै तुम्हे जंगल में तुम्हारे असली रूप( शेरनी) में छोड़ आती हूँ, परन्तु वह हर बार मना कर देती है|वह हिंसात्मक जीवन से ऊब चुकी है|उसे मेरी दोस्ती और मेरा प्यार काफी पसंद आ रहा है| मैंने इसे अपना आकार छोटा और बड़ा बनाना सिखा दिया है ,जिससे यह अपना बचाव हर संकट में कर सकती है| अब इसकी दोस्ती तुम्हारे से भी हो रही है, यह एक अच्छा संकेत है|मायोंग गाँव के बूढ़े मायोंग में योनी कुण्ड हिंदुओं की साधना के लिए और अष्टदल कुण्ड  बोधिक तांत्रिकों के लिए है| देवरी ने बताया मुझे लोगों को कष्ट पहुँचाना पसंद नहीं आता|मैं जादू का प्रयोग लोगो की भलाई के लिए करती हूँ| लोगों की बीमारियाँ ठीक करती हूँ |मेरा प्रयास है की मै अपनी जादू विद्या से लोगो का जीवन ओर सुखी बना सकूँ |जो तंत्र साधक अपनी विद्या का प्रयोग दूसरों को कष्ट पहुँचाने में करते है उनका अन्त समय भी यातानाओं से गुजरता है| मैं अपनी तंत्र विद्या का प्रयोग काफी सोच समझ कर करती हूँ|
    अनवी देवरी की बातों से काफी विचलित लग रही थी|जब उसे पता चला की लाल चिड़िया वास्तव में एक शेरनी है तो उसे काफी डर लगा| परन्तु देवरी ने आश्वस्त किया की दोस्त कभी किसी दोस्त को नुकसान नहीं पहुँचाते| इसके बाद देवरी ने ताम्बे की थाली में पानी लिया और उसको अभिमन्त्रीत किया| मंत्रों  के प्रभाव से पानी उबलने लगा और थोड़ी देर बाद पानी ठंडा हो गया| उसमें कांच  की तरह पर्तिबिम्ब दिखने लगा| वह अनवी से कहने लगी ये देखो पबित्रो वन्य प्राणी अभ्यारण्य में वह बाग़ है जहाँ तुम लाल चिड़िया, बन्दर और गैंडे के साथ खेला करती थी| यहीं पर तुम्हारे पास एक तितली भी आई थी| ये सभी मेरे दोस्त है और मेरी सम्मोहन शक्ति से मेरे वश में रहते है| हम कभी किसी को नुकसान नहीं पहुंचाते है| हाँ अपनी सुरक्षा अवश्य करते है| एक सिंग वाला गैंडा अपने परिवार के साथ हंसी ख़ुशी से रह रह है| नदी किनारे बाग़ हमारा मिलने का स्थान है| में उसे एक फुट का आकार दे देती हूँ| मेरे निर्देशों के अनुसार ही वह तुम्हारे साथ बाग़ में खेल रहा था| बन्दर भी मेरे मन्त्रों के प्रभाव से आकार में छोटा और बड़ा हो जाता है| यह कामाख्या मंदिर के नज़दीक ब्रह्मपुत्र नदी के टापू पर बने उमानंद मंदिर के पास बीमार अवस्था में मिला| इसका असली रंग सोने जैसा है| सुनहरा लंगूर (Golden langoor): ब्रह्मपुत्र नदी के आसपास पाया जाता है। अब इनकी संख्या तेजी से घट रही है।असम के चिड़ियाघर के परिसर में विलुप्तप्राय: सुनहरे लंगूरों के अस्तित्व को बचाने के लिए जल्द ही एक प्रजनन केन्द्र खोला जा रहा है| विशाल ब्रह्मपुत्र के पीकाक टापू पर स्थित उमानंद मंदिर अपनी वास्तुशिल्पीये विशेषता के लिए जाना जाता है। भगवान शिव को समर्पित इस मंदिर का निर्माण अहोम राजा गदाधर सिंह के शासन काल में हुआ था। यहां हर साल फरवरी के महीने में पड़ने वाली शिवरात्रि के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालू आते हैं। मंदिर तो अपने आप में खूबसूरत है ही, पर मंदिर के चारों ओर बहने वाले ब्रह्मपुत्र का नज़ारा मंत्रमुग्ध कर देने वाला होता है। उपचार के बाद इसको मैने वापिस उमानंद मंदिर परिसर में छोड़ना चाहा परन्तु इसने मेरे सानिध्य में रहना ही पसंद है|एक बार  में नदी किनारे बाग़ में इस से साथ बैठी खेल रही थी , प्यार से इसके बालों में हाथ घुमा रही थी| तभी एक प्यारी से तितली मेरे सर पर बैठ गई और कहने लगी क्या सारा प्यार इसी में बाँट  दोगी ? मुझे अपना दोस्त नहीं बनाएगी ? मुझे उसकी भी दोस्ती  पसंद आई | और अब यह तितली जिस भी प्राणी पर बैठती है वह और तितली दोनो अदृश्य हो जाते है|इस प्रकार संकट में पड़े जीवो को अदृश्य कर उनका बचाव कर देती है और इस का स्वयं का भी बचाव हो जाता है| इस थाली में प्रतिबिम्ब देख कर में सभी से संपर्क बना लेती हूँ और उनकी समस्या का समाधान भी हो जाता है| अनवी को  इस रहस्मयी दुनियां से काफी डर लग रह था|वह जंगल के जीवों में इतनी प्रगाढ़ मित्रता और परोपकार की भावना  से काफी प्रभावित हो रही थी|परन्तु उसे याद आया की उसकी छुट्टियाँ ख़त्म होने को है|कल ही उसे अपनी पाठशाला जाना है|उसने रति से पाठशाला पहुँचाने का आग्रह किया| रति पूर्व की तरह एक बड़ी लाल चिड़िया बन गई और अनवी को अपने ऊपर बैठा एक लम्बी उड़ान के बाद गुरुग्राम पहुँचा  दिया| अनवी ने लाल चिड़िया को अलविदा कहा और अपनी कक्षा  में पहुँच गई| 

Saturday, 1 September 2018

यात्रा का शुभारम्भ

                                              मेरी पहली यात्रा 

      यहाँ पर उपरोक्त विवरण केवल इस लिए किया गया है की आप आगे की कहानी को समझ सके और पूरा मनोरंजन कर सके |असम में कई वन्य प्राणी अभ्यारण्य है | जो सभी के लिए ज्ञानवर्धक है |गुरूग्राम के एक विद्यालय के विद्यार्थी अपने साथियों के साथ असम घूमने गए और वहाँ  पर उन्होंने क्या देखा और क्या समस्याएँ आई , इस कथा का असली कथानक है |

    अनवी अपनी कक्षा के साथ असम भ्रमण के लिए आती है | उनका विचार असम के वन्य प्राणी अभ्यारण्य और वन्य राष्ट्रिय उद्यान देखने का था| इनमे प्रमुख निम्नलिखित है :-

राष्ट्रीय उद्यान व वन्यजीव अभ्यारण्य में अंतर :- वन्यजीव अभ्यारन्यो   का गठन किसी एक प्रजाति अथवा कुछ विशिष्ट प्रजातियों के संरक्षण के लिये किया जाता है, अर्थात ये विशिष्ट प्रजाति आधारित संरक्षित क्षेत्र होते हैं ! जबकि राष्ट्रीय पार्क का गठन विशेष प्रकार की शरणस्थली के रूप में संरक्षण के लिये किया जाता है अर्थात इस विशेष शरणस्थली क्षेत्र में रहने वाले सभी जीवों का संरक्षण समान रूप से किया जाता है !
·          राष्ट्रीय पार्क में किसी भी प्रकार के अधिवास और मानवीय गति विधि की अनुमति नही होती है , यहां तक कि जानवरों को चराने या जंगली उत्पादों को इकट्ठा करने की अनुमति भी नही होती है| जबकि वन्यजीव अभयारण्य में मानव गतिविधियों की अनुमति दे दी जाती है !
·          एक वन्यजीव अभ्यारण्य में शिकार अनुमति के बिना निषिद्ध है , हालांकि पशु चराने और मवेशियों की आवाजाही की अनुमति है ! जबकि एक राष्ट्रीय उद्यान में शिकार और चराना पूरी तरह से निषिद्ध हैं !
·          एक वन्यजीव अभ्यारण्य को राष्ट्रीय पार्क में परिवर्तित किया जा सकता है जबकि एक राष्ट्रीय पार्क को अभ्यारण्य घोषित नही किया जा सकता !
·          वन्यजीव अभ्यारण्य और राष्ट्रीय पार्क दोनों की घोषणा राज्य सरकार केवल आदेश देकर कर सकती है जबकि सीमा में परिवर्तन के लिये राज्य विधान मंडल को एक संकल्प पारित करना होता है !

. मानस नेशनल पार्क:-असम के गुवाहाटी में स्‍थित मानस नेशनल पार्क विश्‍व धरोहरों में शामिल है। हिमालय की तलहटी में स्‍थित इस अभ्यारण्य में दुर्लभ वन्‍य जीव पाए जाते हैं। जिसमें कि हेपीड खरगोश, गोल्‍डन लंगूर और पैगी हॉग शामिल हैं। इन्‍हें देखने लोग दूर-दूर से आते हैं। 
2. ओरंग नेशनल पार्क:-असम के शोणितपुर जिले में स्‍थित ओरंग नेशनल पार्क गैंडे के लिए जाना जाता है। यहां आपको काफी संख्‍या में गैंडे मिलेंगे। साल 1985 में इसको अभ्यारण्य घोषित किया गया। इसके बाद यहां पर पर्यटकों का तांता सा लगने लगा।
 ३. नमेरी नेशनल पार्क:-असम के तेजपुर से करीब 35 किमी दूर स्‍थित है नमेरी नेशनल पार्क। यहां आपको हाथी देखने को मिल जाएंगे आप इनकी सवारी भी कर सकते हैं। इसके अलावा पक्षियों से लगाव रखते हैं तो करीब 300 चिड़ियों की प्रजातियां यहां पाई जाती हैं।
. काजीरंगा नेशनल पार्क:-यह असम का सबसे बड़ा और मशहूर राष्‍ट्रीय उद्यान है। यह अभ्यारण्य एक सींग वाले गैंडा के लिए जाना जाता है। इसके अलावा पक्षियों व अन्‍य जीव-जंतुओं की तमाम प्रजातियां यहां देखने को मिल जाती हैं।
.  डिब्रू सैखोवा नेशनल पार्क:-असम के डिब्रूगढ़ में स्‍थित सैखोवा नेशनल पार्क मुख्‍य रूप से सफेद पंखों वाले देवहंस के संरक्षण के लिए बनाया गया था। बाद में यह राष्‍ट्रीय उद्यान जंगली घोड़ों और चमकदार सफेद पंखों वाली बत्तख के रूप में प्रसिद्ध हो गया। यहां पक्षियों की करीब 350 से ज्‍यादा प्रजातियां पाई जाती हैं।
पोबीटोरा वन्य जीव अभ्यारण्य :- यह गुव्हाटी से ५० किलोमीटर दूर मारी गाँव जिले में है |इसके किनारे पर मायोंग गाँव स्थित है | यह अभ्यारण्य मुख्य रूप से एक सींग वाले गेंडे के लिए जाना जाता है। 30.8 वर्ग किमी में फैले इस अभ्यारण्य में 16 वर्ग किमी में सिर्फ गेंडे रहते हैं। चूंकि यहां बड़ी संख्या में गेंडें हैं, इसलिए ऐसा कहा जाता है कि गेंडे अभ्यारण्य से बाहर भी निकल आते हैं। गेंडें के अलावा इस वन्य जीव अभ्यारण्य की दूसरी विशेषता यहां हर साल आने वाले प्रवासी पक्षी हैं। यहां हर साल करीब 2000 प्रवासी पक्षियां आते हैं। अभ्यारण्य में एशियाई भैंस, तेंदुआ, जंगली बिल्ली और जंगली भालू सहित कई अन्य जीव भी देखे जा सकते हैं ७.  चक्रशिला वन्यजीव अभयारण्य:- चक्रशिला वन्यजीव अभयारण्य भारत का दूसरा गोल्डन लंगूर के निवास स्थान के लिए प्रसिद्ध है। यह पहले एक आरक्षित वन था, लेकिन वर्ष 1 99 4 में इसे वन्यजीव अभयारण्य घोषित किया गया था। इस पार्क में पर्यटक 14 विभिन्न प्रजातियों की सब्जियों, 60 प्रकार की मछली और उभयचर की 11 प्रजातियों के अलावा पक्षियों की 273 प्रजातियों को देख सकते हैं। वन्यजीव अभयारण्य में दो झीलें हैं, जो इस पार्क की सुन्दरता को बढ़ाती हैं, इन झीलों को धीर बील और डिप्लाई बील कहा जाता है, और ये अभयारण्य पर दोनों तरफ स्थित हैं।
८. होलोगापार गिब्बन वन्यजीव अभयारण्य :- भारत में एकमात्र वन्यजीव अभयारण्य है जो पहाड़ी गिब्बन का घर है। यह छोटा वन्यजीव अभयारण्य बंगाल धीमी लॉरी, हाथी, बाघ, तेंदुए, पैंगोलिन, सुअर-पूंछ वाले मैकक, असमिया मैकक, स्टंप पूंछ मैकक, रीसस मैकक और कैप्ड लैंगर्स का घर है। इसके अलावा यहां भारतीय पाइड हॉर्न बिल, ओस्प्रे, हिल मन्ना और कालीज फिजेंट जैसे अभयारण्य में कई प्रकार के प्रवासी और निवासी पक्षियों को देखा जा सकता है।
    पूरी कक्षा के साथ अनवी असम घुमाने चल पड़ती है |एक सिंग वाले गेंडे को देखने उन का पहला पड़ाव पोबीटोरा वन्य जीव अभ्यारण्य चुना गया| अध्यापक को आचानक ही मायोंग का ख्याल आया, परन्तु उसने बच्चो को मायोंग के बारे में कुच्छ नहीं बताया| पूरा समूह पोबीटोरा वन्य जीव अभ्यारण्य की और बढ़ रहा था| अचानक अनवी को रास्ते में एक गुड़ियाँ मिली| जिसको अनवी ने छुपाके अपने पास रख लिया| अनवी एक बहदुर लड़की थी| उसे डर नहीं लगता था |वह अपने साथियों के साथ अभ्यारण्य में घूम रही थी | सभी बच्चे बड़े चाव से अभ्यारण्य देख रहे थे | बच्चे हाथी की सवारी का आनंद ले रहे थे |यहाँ तरह तरह के पक्षी थे | अनवी रंग बिरंगे पक्षियों को देख कर काफी खुश थी |अचानक एक छोटी लाल चिड़िया उड़ कर अनवी के कंधे पर आ बैठी| अनवी  चिड़िया को देख काफी खुश हुई | वह प्यार से उसे सहलाने लगी |वह उससे बातें करने लगी | यह जान कर अनवी को आश्चर्य हुआ की चिड़िया उस की बोली समझ रही थी और हिंदी बोल भी रही थी |अपनी जेब से बिस्कुट निकल कर अनवी ने चिड़िया को खिलाया |अनवी प्यार से उसे पूछ रही थी भूख लगी है प्यास लगी है | इस पर चिरिया ने कहा नहीं मुझे भूख प्यास नहीं लगी परन्तु मै तुम्हे अपना दोस्त बनाना चाहती हूँ | अनवी ने ख़ुशी ख़ुशी उस की दोस्ती स्वीकार कर ली और उसे प्यार करने लगी | नए दोस्त पाने के चक्कर में अनवी अपनी कक्षा से बिछुड़ गयी और उसके साथ बैटन में लगी रही |जब उसो अपने साथी कहि नहीं मिले तो वह उदास हो गयी |कोई बात नहीं मैं तुम्हे अपने घर ले जाउंगी| अब अनवी चिड़िया के घर चली गई | चिड़िया एक पेड़ की शाखा पर बैठ गई और पेड़ से एक मीठा फल उसको खाने को दिया| अनवी ने वह फल खाय और खाते ही वह चिड़िया जितनी छोटी हो गयी |अब वह लाल चिड़िया के साथ पेड़ की टहनी पर बैठ सकती थी | अचानक अनवी का पेड़ की शाखा से संतुलन बिगड़ गया और नीचे बह रही नदी में गिर गई |वह नदी के पानी में नीचे और नीचे जाती जा रही थी| उसको पानी में साँस लेने में कोई परेशानी नहीं हो रही थी | नदी के तल में उसे सुंदर सुंदर रंग बिरंगी मच्छालियाँ मिली |इन्हें पा कर अनवी काफी खुश थी| अचानक एल लाल मच्छली उसके हाथ पर आ बैठी | अनवी ने प्यार से उस मच्छली पर हाथ फेरा और वह अपनी वास्तविक आकार में आ गई | अब वह नदी जल से बाहर आ गई थी | वहां उसको लाल चिड़िया भी नहीं डिकी दी | ना ही लाल मच्छली उसके साथ थी | अब वह अकेली नदी किनारे बैठी थी |वह अपनी कक्षा से भी बिछुड़ चुकी थी |उसको रह रह कर अपने पापा की याद आ रही थी |घर पर उसके पास एक प्यारा सा पिल्ला था| आब अनवी को उस पिल्ले की चिंता सताने लगी | उसका नाम मिन्नी रखा हुआ था | उसको अपनी चिंता की बजाय मिन्नी की चिंता सता रही थी | पता नहीं मिन्नी ने खाना खाया या नहीं| वह पहली बार मिन्नी से लम्बे समय के लिए अलग हुई थी | अनवी विचारों में खोई हुई थी अचानक उस को लाल चिड़िया की आवाज सुनाई  दी |वह उसको इधर उधर खोजने लगी |लाल चिड़िया एक पेड़ से दुसरे पेड़ पर फुदक रही थी| अनवी उसका पीछा करती करती दूर पहुँच गयी | वहां उसको एक दरवाजा दिखाई दिया | अनवी उस दरवाजे में प्रवेश कर गई| दरवाजे से वह एक बड़े कमरे में पहुँच गई |वहां उसे चार दरवाजे दिखाई दिए | परन्तु सभी पर ताले लगे हुए थे| पास में पड़ी एक मेज पर एक चाबी रखी हुई थी| उस ने चाबी उठाई और बरी बरी से ताले खोलने का प्रयास करने लगी| अंत में एक दरवाजा खुल गया| और वह उस कमरे में प्रवेश कर गई| उस कमरे में एक रसोई थी| उसने रसोई में रखे सामान की तलासी ली | अंत में उसे एक बर्तन में दूध मिला|दूध का स्वाद कुछ अलग लग रहा था| परन्तु भूख में जो मिले वाही उपयुक्त होता है| जैसे ही अनवी ने दूध पिया उसे नींद आने लगी| और वह वहीँ पर लुढ़क गई | जब उसकी आँख खुली तो उसने अपने आप को एक सुंदर बैग में पाया|उसके कपडे भी बदले जा चुके थे |किसी ने उसे स्नान करवा कर कपडे बदल दिए थे|अचानक रास्ते में मिली गुडिया का ख्याल आया  और उसने पाया की गुडिया नए कपड़ो में भी थी|उसने गुडिया को धयान से देखा उसके कपडे भी बदले जा चुके थे| वह उसके बालों में हाथ घुमाने लगी| हाथ घुमाने से उसके पास लाल चिड़िया, एक छोटा सुनहरे रंग का बन्दर जो केवल छ इंच का था| अनवी ने उसको अपनी हथेली पर बैठाया और प्यार करने लगी| तभी वहां पर एक छोटा एक सिंग वाला गैंडा आ गया| वह मुसकिल से आकर में एक फूट का होगा| अनवी उसको आराम से उठा सकती थी| अनवी ने पहले कभी गैंडा नहीं देखा था| हाँ गैंडे के चित्र अवश्य देखे थे| उसके छोटे आकर को देख वह चकित नहि हुई | उसको गैंडे के असली आकर का पता ही नहीं था| अब बन्दर और चिड़िया उसके कंधो पर बैठे थे| वे दोनों उसके बालों से खेल रहे थे| नए ख़ूबसूरत साथी पा कर अनवी अपनी चिंताए भूल चुकी थी | उसके पास ही एक नदी बह रही थी| उसमें उसे एक नौका आती दिखाई दी | वहां यात्री एसी नौकाओं की यात्रा का आनद लेते है| नौका उसके नजदीक से गुजर रही थी| नौका में बैठे यात्रियों में काफी कोतुहल था| यात्री कह रहे थे एक प्यारी सी बच्ची बाघ में अकेली बैठी थी| उस के पास वह लाल चिड़िया, सुनहरे छोटे लंगूर के साथ खेल रही थी| उसके पास एक छोटा सा गैंडा भी था| नाविक ने उन सभी को चुप रहे की सलाह दी और जल्दी से नौका आगे बाधा ली|उस इलाके से बाहर आने पर नाविक ने सुख की साँस ली | उसने यात्रियों को बताया की बहुत अच्छा हुआ हम सकुशल बहार आ गए| आप लोंगों ने बाग़ में क्या देखा? क्या इतना छोटा गैंडा कभी होता है? सभी यात्रियों ने कहा नहीं| गैंडा औसतन एक हाथी जितना आकार में होता है| फिर वह कोई मूर्ति भी नहीं थी| नाविक ने बताया यह इलाका मयोंग गाँव के नजदीक पड़ता है| यहाँ हर घर में जादू टोना होता है|यहं की औरते इन्सान को पशु-पक्षी, मधुमक्खी, चिड़िया या बोना बना कर घर में पालतू पशु की तरह रख लेती है और घर का कम करवाती है| जंगली हिंसक जानवरों को सम्मोहित कर के पालतू बना लेती है|आप सभी ने देखा होगा एक सुंदर सी लड़की के पास केवल छ इंच का लंगुर और एक फुट का एल सिंग वाला गैंडा था| क्या आप में से किसी ने एक फुट का गैंडा इस से पहले देखा या सुना है| नाविक की बात सुन कर कुछ यात्री डर गए|और शेष यात्रयों में इस बारे में और जानने की उत्सुकता दिखाई|यात्रियों को नदी के किनारे उतार कर नाविक ने विदा ली|
    उधर अनवी बाग़ में नदी किनारे लाल चिड़िया,छोटे लंगूरऔर गैंडे के साथ खेल रही थी|वह नए साथियों के साथ खेल में व्यस्त थी| उसे घर और पाठशाला की याद बिलकुल नहीं आई|वह इन सभी नए साथियों की बोली समझती थी|थोड़ी देर में अनवी को प्यास लगी | उसने लंगूर से पानी माँगा| लंगूर झटसे एक नारियल के पेड़ से नारियल तोड़ लाया और उसका पानी पीने के लिए नवी को डे दिया| नारियल का ताजा पानी स्वादिष्ठ था| अनवी ने उनको कहा आओ अब हम खेलते है| मैं तुम्हारी अध्यापिका हूँ| में तुम्हें पढ़ती हूँ| बन्दर बहुत से केले के पत्ते तोड़ कर ले आया और पत्तों पर तिनके से लिख लिख कर एक घंटा पाठशाला चली| सभी को भूख लग आई थी|अब कुछ खाने को मिलाना चाहिए| बन्दर ने गैंडे को लाल फूल खाने को दिए | जिनको खा कर गैंडा अपने वास्तविक रूप में आ गया| तीनो को अपनी पीठ पर बैठा कर सघन वन की और चल पड़ा| आधे घंटे की यात्रा के बाद वह एक आलीशान महल के सामने खड़ा था|महल की भव्यता देखते ही बनती थी| उसके सामने गैंडे की सवारी कोई शाही सवारी जैसी लग रही थी| द्वार पर पहुचते ही हमारा भव्य स्वागत किया गया| हमें वहां शाही मेहमान की तरह रखा गया|पूरा महल रोशनी से जगमगा रहा था| नाच गाने का कार्यक्रम चल रहा था|युगल अपनी सर्वश्रेठ कला का प्रदर्शन का कर रहे थे| पूछताछ करने पर पता चला की यह सब बिहू की तैयारी चल रही थी|२०-२५ युवक युवतीयों का समूह अपनी कला का प्रदर्शन करता है | और इस दौरान अपनी पसंद का जीवन साथी का चुनाव कर शादी संपन्न करते है|यही कारण है की असम में ज्यादातर शादीयां बैशाख मास में ही संपन्न हो जाती है|
    बिहु असम के तीन अलग अलग सांस्कृतिक उत्सवों के एक समूह को दर्शाता है और दुनिया भर के असमी प्रवासी इसे धूमधाम से मनाते हैं। यद्यपि वे प्राचीन संस्कार और प्रथाओं को उनका  मूल मानते है |हालांकि उन लोगो ने निश्चित शहरी सुविधाओं को अपना लिया है |और हाल की दशकों में शहरी और लोकप्रिय त्योहार बन गए हैं। उनमें से एक अप्रैल में मनाये जाने वाले असमिया नव वर्ष भी शामिल है। बिहु शब्द बिहु नृत्य और बिहू लोक गीत दोनो की और संकेत करते है। रोंगाली बिहु या बोहाग बिहु असम का एक महत्वपूर्ण त्योहार है। बिहु असम के सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार है, जो सभी असमियों द्वारा बहुतायत में मस्ती के साथ मनाया जाता है बिना उनके जाति, धर्म और विश्वास में भेद किये।
    बिहु शब्द दिमासा लोगों की भाषा से ली गई है| जो की प्राचीन काल से एक कृषि समुदाय है। उनका सर्वोच्च देवता ब्राई शिबराई या पिता शिबराई हैं। मौसम की पहली फसल अपनी शांति और समृद्धि की कामना करते हुए ब्राई शिबराई के नाम पर अर्पित किया जाता हैं। तो 'बि' मतलब 'पुछना' और 'शु' मतलब पृथ्वी में 'शांति और समृद्धि' हैं। अत: शाब्दिक रूप से बिशु धीरे-धीरे भाषाई तहजीह को समायोजित करने के लिये बिहु बन गया। अन्य सुझाव यह हैं कि 'बि' मतलब 'पुछ्ना' और 'हु' मतलब 'देना' और वही से बिहु नाम उत्पन्न हुआ। यह " कलागुरु " विष्णु प्रसाद राभा द्वारा कहा गया था । असम में रोंगाली बिहू बहुत सारे परंपराओं से ली जाती हैं जैसे की- बर्मी-चीन, ऑस्ट्रो - एशियाटिक, हिंद-आर्यन| बिहू बड़े ही उत्साह के साथ मनाया जाता हैं। त्योहार अप्रैल के मध्य में शुरू होता हैं और आम तौर पर एक महीने के लिए जारी रह्ता हैं। यह पारंपरिक नव वर्ष है। इसके अलावा दो और बिहु हैं: अक्टूबर में कोंगाली बिहु (सितम्बर विषुव के साथ जुड़े) और जनवरी में भोगाली बिहु (जनवरी संक्रांति से जुड़े)। अधिकांश अन्य भारतीय त्योहारों की तरह, बिहू (तीनों ही) खेती के साथ जुड़ा हुआ हैं, जैसे की पारंपरिक असमिया समाज मुख्य रूप से कृषि पर ही निर्भरीत हैं। वास्तव में, वैसा ही बहुत सारे उत्सब लगभग उसी वक्त पे पुरे भारतबर्श में मनाया जाता हैं।असम में एक साल में तीन बिहु मनाया जाता हैं बोहाग (बैसाख, अप्रैल के मध्य), माघ (जनवरी के मध्य में) और काटी (कार्तिक, अक्टूबर के मध्य) के महीनों में। बिहु प्राचीन काल से असम में मनाया जा रहा हैं। प्रत्येक बिहु खेती कैलेंडर में एक विशिष्ट चरण के साथ मेल खाता हैं। सबसे महत्वपूर्ण और तीन बिहू उत्सव में सब्से रंगीन हैं वसंत महोत्सव "बोहाग बिहू" या रोंगाली बिहू जो कि अप्रैल के मध्य में मनाया जाता हैं। यह उत्सब कृषि सीज़न की शुरुआत को भी दर्शाता हैं। बिहु असम कि सभी भागो में और सभी जाति-जनजाति और धर्म के लोगो द्वारा मनाया जाता हैं। प्रत्यक्षतया यह कहा जा सकता हैं कि बिहु एक धर्मनिरपेक्ष त्योहार हैं जो भीन्न जाति और धर्म के बीच मानवता, शांति और भाईचारा लाता हैं। बिहू में ताल, पेपा (भैंस के सींग से बना एक वाद्य यंत्र) टोका, बाँहि (बांसुरी), क्शुतुली ,गोगोना आदि वाध्य यन्त्र बजाये जाते है|

बिहू नाम के तीन त्योहार
एक वर्ष में यह त्योहार तीन बार मनाते हैं। पहला सर्दियों के मौसम में पौष संक्रांति के दिन, दूसरा विषुव संक्राति के दिन और तीसरा कार्तिक माह में मनाया जाता है। पौष माह या संक्राति को भोगाली बिहू, विषुव संक्रांति को रोंगाली बिहू और कार्तिक माह में कोंगाली बिहू मनाया जाता है।

भोगाली बिहू :पौष माह या संक्राति को भोगाली बिहू मनाते हैं, जो कि जनवरी माह के मध्य में अर्थात मकर संक्रांति के आसपास आता है। इस माघ को बिहू या संक्रांति भी कहते हैं।भोगाली बिहू पौष संक्रांति के दिन अर्थात मकर संक्रांति के दिन या आसपास आता है। इसे भोगाली इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इसमें भोग का महत्व है अर्थात इस दौरान खान-पान धूमधाम से होता है और तरह-तरह की खाद्य सामग्री बनाई और खिलाई जाती है।

भोगाली या माघ बिहू के पहले दिन को उरुका कहते हैं। इस दिन लोग खुली जगह में धान की पुआल से अस्थायी छावनी बनाते हैं जिसे भेलाघर कहते हैं। इस छावनी के पास ही 4 बांस लगाकर उस पर पुआल एवं लकड़ी से ऊंचे गुम्बज जैसे का निर्माण करते हैं जिसे मेजी कहते हैं। गांव के सभी लोग यहां रात्रिभोज करते हैं।अम्बुबाशी मेला, परशुराम मेला, दोल जात्रा मेला, अशोकष्टमी मेला असम के प्रसिद्ध मेले है| उरुका के दूसरे दिन स्नान करके मेजी जलाकर बिहू का शुभारंभ किया जाता है। गांव के सभी लोग इस मेजी के चारों ओर एकत्र होकर भगवान से मंगल की कामना करते हैं।अपनी मनोकामना पूरी करने के लिए लोग विभिन्न वस्तुएं भी मेजी में भेंट चढ़ाते हैं। बिहू उत्सव के दौरान वहां के लोग अपनी खुशी का इजहार करने के लिए लोकनृत्य भी करते हैं।नारियल के लड्डू, तिल पीठा, घिला पीठा, मच्छी पीतिका और बेनगेना खार के अलावा अन्य पारंपरिक पकवान भी बनाए जाते हैं।
    व्यस्त सप्तांत के बाद काफी तोफो के साथ विदा किया गया| गैंडा अपनी तीनो सवारियों को लेकर पुनः नदी किनारे बगीचे में आ  गया | यहाँ से हम शाही सवारी पर बैठ अभ्यारण्य देखने गए| पोबीटोरा वन्य जीव अभ्यारण्य गुवाहाटी से 50 किमी दूर मारीगांव जिले में स्थित है। यह अभ्यारण्य मुख्य रूप से एक सींग वाले गेंडे के लिए जाना जाता है। 30.8 वर्ग किमी में फैले इस अभ्यारण्य में 16 वर्ग किमी में सिर्फ गेंडे रहते हैं। चूंकि यहां बड़ी संख्या में गेंडें हैं, इसलिए ऐसा कहा जाता है कि गेंडे अभ्यारण्य से बाहर भी निकल आते हैं। गेंडें के अलावा इस वन्य जीव अभ्यारण्य की दूसरी विशेषता यहां हर साल आने पर्यटक के लिए  पशु पक्षियों,वनस्पति और गेंडें के अलावा इस वन्य जीव अभ्यारण्य की दूसरी विशेषता यहां हर साल आने वाले प्रवासी पक्षी हैं। यहां हर साल करीब 2000 प्रवासी पक्षियां आते हैं। अभ्यारण्य में एशियाई भैंस, तेंदुआ, जंगली बिल्ली और जंगली भालू सहित कई अन्य जीव भी देखे जा सकते हैं। अक्टूबर से अप्रैल के बीच इस अभ्यारण्य को घूमना सबसे अच्छा रहता है। सड़क मार्ग के जरिए गुवाहाटी से पोबीटोरा वन्य जीव अभ्यारण्य पहुंचने में एक घंटे का समय लगता है। पर्यटकों का एक दल हमारे पास आकर रूका | उन्हों बताया  की सड़क मार्ग से एक घंटे के सफ़र के बबाद ब्रहमपुत्र नदी के पुल को पार कर के मायोंग गाँव पहुंचे है|१६किलोमीटर में केवल गैंडे ही रहते है| भोजन की तलाश में गैंडे नजदीक के गाँव में भी आ जाते है| दो घंटे की यात्रा के बाद हम अपने प्रिय बगीचे में वापिस आ गए| हमें सभी को भूख लग रही थी| बन्दर द्वारा लाया लाल फूल खाने से गैंडा पुनः छोटी आकृति में आ गया| हम चारों उसी बगीचे में मस्ती कर रहे थे| अचानक एक तितली वहां पर आ गई |और वह अनवी के बालों में बैठ गई| तितली के बैठते ही अनवी अद्रश्य हो गई| बन्दर यह सब देख रह था | उसने बिना समय गंवाए तितली को पकड लिया| तितली के अनवी के ऊपर से हटते ही अनवी फिर से दिखाई देने लगी| ज्यों ही बन्दर तितली को अपने मुहं में डालने लगा वह चिल्लाई मुझे छोड़ दो में फिर से एसी गलती नहीं करूंगी | अनवी सब से पूछने लगी क्या बात है क्या हुआ? इस पर तितली ही बताने लगी की में जिस प्राणी पर बैठ जाती हूँ ना तो वह और नहीं मैं किसी को दिखाई देते है| अनवी को यह काफी अच्छा लगा| उसने तितली को अपने हाथ में लिया और प्यार से तितली को देखने लगी| बन्दर ने कहा अब तितली को छोड़ दो| तितली को छोड़ देने से अनवी पुनः दिखाई देने लगी| अब तितली भी उनके समूह में शामिल हो गई | काफी दिन यों ही सैर सपाटे में बीत गया|एक दिन अचानक अनवी को घर की याद आ गई और वह उदास हो गई और रोने लगी|दोस्तों ने अनवी के रोने का कारन पूछा तो उसने बताया की वह घर जाना चाहती है| चरों दोस्त अनवी को मानाने में लगे हुए थे तभी अनवी की आँख से आंसू उसके पास रखी गुडिया पर गिर गए | आंसू गिरते ही गुडिया जोर जोर से हंसाने लगी| अचानक हंसने की आवाज से सभी चोक गए|  बन्दर ने गुडिया को अपने हाथ में उठाया| वह गुड़ियाँ जादू की गुडिया थी| बन्दर ने गुडिया का हाथ मरोड़ा तो वह रोने लगी और कहने लगी-मैं रस्ते में पारी हुई थी| सारे बच्चे आगे निकल गए परन्तु अनवी ने मुझे उठा लिया|तभी से में इस के साथ घूम रही हूँ|मुझ पर काला जादू कर के रास्ते में डाला गया था|मेरे जादू से असर से आप सभी पर कोई विपत्ति नहीं आई| यदि मेरे गले में बंधा काला धागा कोई तोड़ दे तो में जादू से मुक्त हो जाऊंगी |धागा पुनः बांधने से में फिर सर जादुमइ हो जाऊंगी| बन्दर ने झट से व कला धागा तोड़ दिया और अनवी को धागा दे दिया|अब गुडिया एक साधारण गुडिया रह गई थी|
    सारे दोस्त बैठे बैठे एक दुसरे को अपनी अपनी कहानी बता रहे थे| अबे से पहले गैंडे ने बताया – दिखने को तो में गैंडा हूँ परन्तु मैं भी इन्सान हूँ | एक जादूगर ने अभिमंत्रित कर के एक लोहे की कील रस्ते में गाड दी ताकि वहां से गुजरने वाले किसी भी हिंसक जानवर के पैर में लगे और जादूगर उस को वश में कर सके| दुर्भाग्य से वह कील मेरे पैर में लगी और अब में पूर्ण रूप से उसके काबू में हूँ|  मन्त्रों सर उसने मेरी सीमा को बांध रखा है| में इस से बाहर नहीं जा सकता हूँ| में इंसान से पालतू गैंडा बन गया हूँ| यदि मेरे पैर से यह कील निकल दी जाये तो में पुनः इंसान बन जाऊँगा | अनवी ने गैंडे के पैर से कील निकल दी और वह गैंडे से इंसान बन गया|उस आदमी ने बताया की में पूरी तरह जादू के प्रभाव से मुक्त नहीं हुआ हूँ| यदि तुम यह कील फिर से जमीन में गाड दो गी तो में तुम्हारे पास गैंडा बनकर ही आ जाऊँगा| अनवी ने उस कील ओ अपने पास रखा और उसको अलविदा कहा|
    अब लाल चिड़िया ने अपनी कहानी सुनानी आरम्भ की | वह कहने लगी – मायोंग गाँव में मै अपने पति के साथ रह रही थी| मेरा नाम शुबाँगी है| मेरी पडोसन ने मेरे पति को मेंढा बना कर अपने घर में बांध लिया| रात को उसको आदमी बना कर अपने पास रखती और घर व खेत का सारा काम करवाती| कई सालों तक में अपने पति को तलाश करती रही| साद साल बाद मुझे एक अघोरी बाबा ने सारा रहस्य बताया| बदले की आग में मैंने अघोरी बाबा से साधना सीखी और अपने पति को मुक्त करवाना चाहा| परन्तु बाबा के कहने पर मैंने अपनी कला का उपयोग जन कल्याण में लगाना आरम्भ कर दिया|अब में अपनी इच्छा अनुसार जवान लड़की या लाल चिड़िया बन सकती हूँ| में अपना आकर अपनी इच्छा अनुसार छोटा या बड़ा कर सकती हूँ|

    सुनहरे लंगूर जिसे हम यहाँ बन्दर कह रहे है ने अपनी कहानी बतानी आरम्भ की – मै कामख्या मंदिर के पास नदी के टापू में अपने परिवार के साथ रहता था| एक दिन अम्बुवाची पर्व के दोरान एक अघोरी अपनी साधना में लीन था| मैने शरारत वश उसकी हवन सामग्री उठा कर ब्रहमपुत्र नदी में डाल दी| अघोरी ने मुझे तंत्र विद्या से इस अभ्यारण तक सीमित कर दिया| मेरे परिवार के विलाप करने पर उसने कहा की एक लड़की के साथ रहने पर वह तुम्हारे साथ उमानंद मंदिर में आएगी और तुम्हे यहीं छोड़ जायेगी| इसके बाद तुम पुनः यहाँ रह ने लगोगे|

    अब लाल तितली अपनी कहानी सुनाने लगी- में एक सुंदर लड़की थी| बिहू नृत्य के दोरान एक लड़के से प्यार करने लगी| परन्तु वह लड़का किसी और लड़की से प्यार करता था| वह लड़की काला जादू जानती थी| उसने मुझे जादू से तितली बना दिया| एक अघोरी की कृपा से में अदृश्य होने का जादू जानती हूँ | में पुनः लड़की भी बन सकती हूँ परन्तु मायोंग की सीमा से बहार|

अब बन्दर ने लाल चिड़िया को एक लाल मच्छली दी जिससे उसका आकर एक हाथी जितना हो गया| अनवी उस पर बैठ गई| चिड़िया ने पल झपकते ही उसे अनवी के घर के पास वाले बगीचे में उतार दिया|घर के दरवाजे पर पहुँचते ही अनवी का मिन्नी ने अपना  पुन्छ हिला कर स्वागत किया| उसके विद्यालय वाले और अनवी के पापा अनवी को गुवाहटी में तलाश कर रहे थे| अनवी के सहपाठी और मैडम पिछले सप्ताह ही गुरुग्राम पहुँच चुके थे|अनवी ने घर की छत पर खड़े हो कर लाल चिड़िया को बिदाई दी| लाल चिड़िया अब अपने सामान्य आकार में आ चुकी थी|अनवी को उसके घर छोड़ चिड़िया पुनः पोबितोरा के बाग़ में पहुच चुकी थी|

    अनवी अपनी पाठशाला में काफी चर्चा में थी| जब वह अपनी कक्षा में आई तो साथियों के कई सवालों के जबाब देने पड़े|एक ने पूछा अनवी कहा खो गई थी? अनवी ने कहा अरे में खोई थोड़े ही थी , में तो अपने नए दोस्तों के साथ गहन जंगल की सैर कर रही थी| वहाँ पर एक लाल चिड़िया,एक सुनहरे रंग का लंगूर, एक गैंडा और एक तितली मेरे दोस्त बन गए थे|सारे विद्यार्थी अनवी की कहानी अनवी की जुबानी सुन रहे थे| सारे विद्यार्थी अनवी को घेरे खड़े थे, अचानक कमरे में मैडम आई और कहने लगी ये क्या हो रह है| मैडम की आवाज सुन कर सभी विद्यार्थी अपनी अपनी जगह पर बैठ गये |मैडम ने अनवी को अपने पास बुलाया और एक सप्ताह की पूरी कहानी कक्षा में बताने को कहा|अनवी ने अपना सारा वृतांत कह सुनाया |कक्षा के सामने अपनी कहानी सुना कर अनवी गर्वित महसूस कर रही थी| मैडम ने मज़ाक में पूछा अनवी अब मायोंग कब जा रही हो?अनवी ने कहा मैडम जल्दी ही जाना पड़ेगा,साथियों की बहुत याद आ रही है| वे भी मुझे याद कर रहे है|अनवी अब पशु पक्षियों की आवाज समझ सकती थी|इतने में उसे खिड़की में लाल चिड़िया दिखाई दी| वह उसको कक्षा के बाहर बुला रही थी| कक्षा में बात करते करते उसने चिड़िया को कहा ठहरो अभी कक्षा ख़तम होने पर आउंगी| मैडम ने खिड़की की और देखा और पूछा कौन है? तुम्हे कौन बुला रहा है? बाहर तो कोई नहीं है| अनवी ने कहा मैडम दरवाजे पर कोई नहीं है| इस खिड़की में देखो यह लाल चिड़िया पोबीटोरा वन्य जीव अभ्यारण्य से यहाँ मुझे बुलाने आई है|इसने ही मुझे यहाँ तक पहुँचाया था|अनवी की बात सुन कर सारी कक्षा हंसने लगी| यह चिड़िया अपनी इच्छा अनुसार आकर में बड़ी छोटी हो सकती है| इसने मुझे अपने ऊपर बैठा कर केवल दो घंटे में यहाँ पहुंचा दिया था| सारे विद्यार्थी अनवी की बातों पर आश्चर्य कर रहे थे|अनवी ने कहा अब आगामी छुट्टियों में मेरा फिर से जाने का कार्यक्रम है |यह लाल चिड़िया मुझे फिर से वहा ले जायेगी| आप सभी लोग मुझे खिड़की से देखना यह चिड़िया मुझे बैठा कर ले जायेगी |अनवी छत पर गई और लाल चिड़िया उसे लेकर उड़ गई| कक्षा के बच्चे खिड़की से उसे जाता देख रहे थे| और अनवी को हाथ हिला कर अलविदा कर रहे थे|