Monday, 15 October 2018

कहानी काज़ीरंगा की

कहानी काज़ीरंगा राष्ट्रीय उद्यान

    अनवी की सहासिक और रोमांच भरी यात्राओं के संस्मरण सभी को बहुत रोमांचित करते थे|इस बार अनवी की अगली यात्रा काज़ीरंगा राष्ट्रीय उद्यान की थी।अनवी ने इस उद्यान के बारे में जो जानकारी इक्कठी की वह इस प्रकार है:-
    यह उद्यान एक सींग का गैंडे (भारतीय गैंडे)  के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है। काज़ीरंगा राष्ट्रीय उद्यान  430 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल में फैला है। इस उद्यान में भारतीय एक सींग वाले गैंडे (राइनोसेरोस, यूनीकोर्निस) का निवास है। काजीरंगा को वर्ष १९०५ में राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया था। सर्दियों में यहाँ साइबेरिया से कई मेहमान पक्षी भी आते हैं, हालाँकि इस दलदली भूमि का धीरे-धीरे ख़त्म होते जाना एक गंभीर समस्या है। काजीरंगा में विभिन्न प्रजातियों के बाज, विभिन्न प्रजातियों की चीलें और तोते आदि भी पाये जाते हैं।

    इस राष्ट्रीय उद्यान का प्राकृतिक परिवेश वनों से युक्‍त है, जहाँ बड़ी एलिफेंट ग्रास, मोटे वृक्ष, दलदली स्‍थान और उथले तालाब हैं। एक सींग वाला गैंडा, हाथी, भारतीय भैंसा, हिरण, सांभरभालू, बाघ,चीते, सुअर, बिल्ली, जंगली बिल्‍ली, हॉग बैजर लंगूर, हुलॉक, गिब्‍बन, भेड़िया, साही, अजगर और अनेक प्रकार की चिडियाँ, जैसे- 'पेलीकन'बतख, कलहंस, हॉर्नबिल, आइबिस, जलकाक, अगरेट, बगुला, काली गर्दन वाले स्‍टॉर्क, लेसर एडजुलेंट, रिंगटेल फिशिंग ईगल आदि बड़ी संख्‍या में पाए जाते हैं।काज़ीरंगा राष्‍ट्रीय उद्यान न केवल भारत में वरन् पूरे विश्‍व में एक सींग वाले गैंडे के लिए प्रसिद्ध है। यह राष्‍ट्रीय उद्यान असम का एकमात्र राष्‍ट्रीय उद्यान है। यह केंद्रीय असम में स्थित है। उद्यान उबड़-खाबड़ मैदानों, लम्बी-ऊँची घासों, आदिवासियों और भयंकर दलदलों से पूर्ण कुल 430 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है| काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान असम के गोलाघाट और नागांव जिलों में फैला है। पूर्वी हिमालय जैव विविधता हॉटस्पॉट के किनारे पर स्थित, पार्क उच्च प्रजाति विविधता और दृश्यता को जोड़ता है|काजीरंगा में लंबा हाथी घास, मार्शलैंड, और घने उष्णकटिबंधीय नम ब्रॉडलीफ जंगलों का विशाल विस्तार है| ब्रह्मपुत्र समेत चार प्रमुख नदियों द्वारा पार किया गया है, और पार्क में पानी के कई छोटे निकायों शामिल हैं। काजीरंगा कई किताबों, गीतों और वृत्तचित्रों का विषय रहा है। पार्क क्षेत्र को ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे 152 किमी तक बढ़ा दिया गया था।
    हाल के दशकों में काजीरंगा कई प्राकृतिक और मानव निर्मित आपदाओं का लक्ष्य रहा है। ब्रह्मपुत्र नदी के अतिप्रवाह के कारण बाढ़ में पशु जीवन का काफी नुक्सान हुआ|यद्यपि काजीरंगा नाम की व्युत्पत्ति निश्चित नहीं है, स्थानीय किंवदंतियों और अभिलेखों से प्राप्त कई संभावित स्पष्टीकरण मौजूद हैं। एक पौराणिक कथा के अनुसार, पासबी गांव से रावणा नाम की एक लड़की, और कार्बी एंग्लोंग से काजी नाम का एक युवक प्यार में गिर गया। यह रिश्ता उनके परिवारों के लिए स्वीकार्य नहीं था| और यह जोड़ा जंगल में गायब हो गया, कभी भी फिर से नहीं देखा गया, और जंगल का नाम उनके नाम पर रखा गया। एक और पौराणिक कथा के अनुसार, सोलेंटा शंकरदेव, सोलहवीं शताब्दी वैष्णव संत-विद्वान थे| एक बार एक बेघर जोड़े, काजी और रंगई को आशीर्वाद दिया, और उनसे इस क्षेत्र में एक बड़ा तालाब खोदने के लिए कहा ताकि उनका नाम अमर  रहे। यह क्षेत्र ब्रह्मपुत्र नदी से घिरा हुआ है, जो उत्तरी और पूर्वी सीमाओं का निर्माण करता है, और मोरा डिफ्लू, जो रूप, दक्षिणी सीमा में पार्क के भीतर अन्य उल्लेखनीय नदियां दीफ्लू और मोरा धनसिरी हैं। काजीरंगा उपजाऊ, जलोढ़ मिट्टी के फ्लैट विस्तार, ब्रह्मपुत्र नदी द्वारा कटाव और गाद बयान द्वारा गठित है
 
    पार्क में तीन मौसम होते हैं: गर्मी, मानसून, और सर्दी। बाढ़ से ज्यादातर जानवर पार्क के दक्षिणी सीमा के बाहर ऊंचे और जंगली इलाकों में स्थानांतरित हो जाते हैं, जैसे कि मिकिर पहाड़ियों। 2012 के अभूतपूर्व बाढ़ में 13 गैंडों और ज्यादातर हॉग हिरण सहित 540 जानवरों की मौत हो गई। कभी-कभी सूखा भी  समस्याएं पैदा कर देता है| जैसे खाद्य की कमी और कभी-कभी जंगल की आग।यहाँ 35 स्तनधारी प्रजातियों की महत्वपूर्ण प्रजनन आबादी है। उद्यान  में ग्रेटर वन-हॉर्नड राइनोसेरोस की दुनिया की सबसे बड़ी आबादी का घर होने का गौरव है जंगली एशियाई पानी भैंस, पूर्वी दलदल वाले हिरण, बड़ी जड़ी-बूटियों वाली  महत्वपूर्ण आबादी में हाथियों ,गौर और सांभर शामिल हैं। छोटे जड़ी-बूटियों में भारतीय मंटजेक, जंगली सूअर, और हॉग हिरण शामिल हैं।काजीरंगा अफ्रीका के बाहर कुछ जंगली प्रजनन क्षेत्रों में से एक है जो बड़ी बिल्लियों, जैसे कि बेंगल बाघ और तेंदुए की कई प्रजातियों के लिए है। अन्य फेलिड में जंगल बिल्ली, मछली पकड़ने की बिल्ली और तेंदुए बिल्ली शामिल हैं। छोटे स्तनधारियों में दुर्लभ हर्पीड हरे, इंडियन ग्रे मोंगोज़, छोटे भारतीय मोंगोस, बड़े भारतीय सिवेट, छोटे भारतीय सिवेट, बंगाल फॉक्स, गोल्डन जैकल, स्लॉथ बीयर, चीनी पांगोलिन, इंडियन पांगोलिन, हॉग बैजर, चीनी फेरेट बैजर और कण उड़ने वाली गिलहरी शामिल हैं। भारत में पाए जाने वाली 14 प्राइमेट प्रजातियों में से नौ पार्क में होती है। उनमें से प्रमुख असमिया मैकक्यू, कैप्ड और गोल्डन लैंगूर, साथ ही साथ भारत में पाए जाने वाले एकमात्र एप, हूलॉक गिब्बन भी हैं।  काजीरंगा की नदियां भी लुप्तप्राय गंगा डॉल्फिन का घर हैं। 

    काजीरंगा को बर्ड लाइफ इंटरनेशनल द्वारा एक महत्वपूर्ण पक्षी क्षेत्र के रूप में पहचाना गया है।यह विभिन्न प्रकार के प्रवासी पक्षियों, पानी के पक्षियों, शिकारियों, सफाई करने वालों और खेल पक्षियों का घर है। सर्दियों के दौरान कम से कम सफेद-सामने वाले हंस, फेरुगिनस बतख, बायर के पोचर्ड बतख और कम सहायक, अधिक सहायक, काले-गर्दन वाले स्टॉर्क और एशियाई ओपनबिल स्टोर्क जैसे पक्षी मध्य एशिया से पार्क में जाते हैं। रिवरिन पक्षियों में ब्लीथ के किंगफिशर, व्हाइट-बेलीड हेरॉन, डाल्मेटियन पेलिकन, स्पॉट-बिल पेलिकन, नॉर्डमैन के ग्रीन्सहैंक, और ब्लैक-बेलेड टर्न शामिल हैं। शिकार के पक्षी दुर्लभ पूर्वी शाही, अधिक दिखने वाले, सफेद- पूंछ, पलास की मछली ईगल, भूरे रंग की मछली ईगल, और कम केस्ट्रल। काजीरंगा एक बार गिद्धों की सात प्रजातियों का घर था, लेकिन गिद्ध की जनसंख्या विलुप्त होने के पास पहुंच गई| केवल भारतीय गिद्ध, पतला-गिद्ध गिद्ध, और भारतीय सफेद-रस्सी वाली गिद्ध जीवित रही है। खेल पक्षियों में थेस्वाम्प फ़्रैंकोलिन, बंगाल फ्लोरिकन, और पीले-कैप्ड कबूतर शामिल हैं। काजीरंगा में रहने वाले पक्षियों के अन्य परिवारों में महान भारतीय हॉर्नबिल और पुष्पित हॉर्नबिल, पुराने विश्व बब्बलर जैसे कि जेर्डन और मार्श बब्बलर्स, बुनाई पक्षियों जैसे आम बाया वीवर, ने फिन के बुनकरों को धमकी दी, होडसन के बुशचैट और पुराने विश्व युद्धपोतों जैसे थ्रस्टेड ग्रासबर्ड। अन्य खतरनाक प्रजातियों में ब्लैक ब्रेस्टेड तोतेबिल और रूफस-वेंटेड घास बब्बलर शामिल हैं।
    दुनिया में सबसे बड़े सांपों में से दो, रेटिक्यूलेटेड पायथन और रॉक पायथन, साथ ही दुनिया में सबसे लंबा विषैला साँप, राजा कोबरा, पार्क में रहते हैं। यहां पाए गए अन्य सांपों में इंडियन कोबरा, मोनोकलेड कोबरा, रसेल के वाइपर और आम क्रेट शामिल हैं। पार्क में पाए गई छिपकली प्रजातियों की निगरानी में बंगाल मॉनिटर और एशियाई जल मॉनिटर शामिल है। अन्य सरीसृपों में कछुए की पंद्रह प्रजातियां शामिल हैं, जैसे स्थानिक असम छत वाले कछुए और कछुए की एक प्रजाति, भूरे रंग के कछुआ| टेट्राओडॉन समेत क्षेत्र में मछली की 42 प्रजातियां पाई जाती हैं।
    इस पार्क में चार मुख्य प्रकार की वनस्पतियां मौजूद हैं। ये जलोढ़ गंदे घास के मैदान, जलोढ़ सवाना  वुडलैंड्स, उष्णकटिबंधीय नम मिश्रित पर्णपाती जंगलों, और उष्णकटिबंधीय अर्ध सदाबहार जंगल हैं।
    निकटतम रेलवे स्टेशन रोवराह है। जोरहाट हवाई अड्डा 97 किलोमीटर है|सैलोनिबारी में तेजपुर हवाई अड्डा लगभग 100 किलोमीटर दूर है), दीमापुर हवाई अड्डा 172किलोमीटर और गुवाहाटी में लोकप्रिया गोपीनाथ बोर्डोली अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे लगभग 217 किलोमीटर दूर है| गुवाहाटी से परिवहन भी उपलब्ध है।
    इन सभी पशु पक्षियों में अनवी को उड़ने वाली गिलहरी बहुत पसंद आई| उड़न गिलहरी (Flying squirrel), जिसको वैज्ञानिक भाषा में टेरोमायनी (Pteromyini) यापेटौरिस्टाइनी (Petauristini) कहते हैं| कृंतक (रोडेंट, यानि कुतरने वाले जीव) के परिवार के जंतु हैं जो पाल उड़न  (ग्लाइडिंग) की क्षमता रखते हैं। इनकी विश्व भर में ४४ वैज्ञानिक जातियाँ हैं| इनमें १२ जातियाँ भारत में पाई जाती हैं। वनों में इनका जीवनकाल लगभग ६ वर्ष का होता है लेकिन चिड़ियाघर जैसी सुरक्षित जगह पर इन का जीवन काल १५ वर्ष तक का हो सकता है| 
 
    अनवी अपनी सहेली लाल चिड़िया के साथ काजीरंगा के नजदीक एक गाँव में ठहरी| गाँव वालों से उसने ढेर सारी बातें की | काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान के नाम की उत्पत्ति के बारे में कई कहानियां सुनी। पार्क के दक्षिण में स्थित कार्बी-एंग्लोंग पहाड़ियां है । करबी भाषा में काज़ी शब्द का अर्थ है 'बकरी' और रंगई का अर्थ है 'लाल' - लाल हिरण की भूमि। एक और पौराणिक कथा है कि वैष्णव धर्म के संस्थापक महात्मा शंकरदेव वर्तमान में काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान के अंदर नर्मोरा बील (झील) के पास डेरा डाले हुए थे। उनके पास अनेकों श्रधालू रोज आते थे,जो उनकी सन्गत का लाभ और अपने दुखों के निवारण के उपाय पुछते थे| एक कर्बी को कोई संतान नहीं थी|उन्होंने महात्मा की खूब सेवा की| महात्मा ने सेवा से खुश हो कर उन को एक केला दिया और अपनी पत्नी  को खिलाने को कहा| महात्मा के कहे अनुसार कर्बी ने केला अपनी पत्नी को खाने को दे दिया| दुसरे दिन कर्बी फिर से महात्माजी के पास आये तो उन्होंने बताया की आप को लड़की होगी और उसी के नाम से यह जगह विख्यात होगी| कर्बी इतनी गुणवान लड़की पा कर बहुत खुश हुआ| समय आने पर कर्बी को पुत्री हुई| और उसका लालन पालन बहुत अच्छी तरह से हुआ|उसका नाम काजी रखा गया|एक अन्य ज्योतिषी ने कारबी के हाथ की रेखाओं को पढ़ कर बताया की काजी को प्रेमयोग है|उसे देखते ही ज्योतिषी ने बताया की यह काजी प्रेम में दीवानी को कर दर-दर भटकती फिरेगी|यह अपने अमर प्रेम से दुनियां को दिखायेगी की इन का प्रेम दुनियां में अमर रहेगा| 
 
    ज्योतिषी की भविष्यवाणी से सतर्क को कर्बी ने काजी को पढ़ने के लिए घर में ही प्रबंध किया|और हर ऐसी घटना से दूर रखने का प्रयास किया जो काजी को प्रेम पास से दूर रखे|एक दिन एक सब्जी बेचने वाला वहां आया और उससे आस पास की औरतों और लड़कियों ने सब्जी खरीदी| काजी खिड़की में से यह सब देख रही थी| उस लडके का नाम रंगा था| रंगा को  देख कर काजी उसके प्रेम पास में फस गई| रंगा को जब भी मौका मिलता उसकी खिड़की के सामने सब्जी बेचने की आवाज लगाता |उस आवाज को सुन काजी सब काम छोड़ खिड़की पर आ जाती|घंटों उसको निहारती रहती|आखिर प्यार को पंख लगे और पूरे गाँव में काजी और रंगा की प्यार की चर्चा होने लगी| कर्बी को जब इस का पता चला तो उसने काजी को बहुत समझाया परन्तु कोई लाभ नहीं हुआ|
 
    गाँव में काबिले के सरदार और उसकी लड़की की ही चर्चा होने लगी|आखिर में कर्बी ने रंगा के गाँव में आने पर प्रतिबंध लगा दिया|क़ाज़ी घर से बाहर नहीं निकल सकती थी| अब काजी बड़ी हो चुकी थी|कर्बी ने अम्बुबाची पूजा का कार्यक्रम बनाया और अपने परिवार सहित माँ कामाख्या के मंदिर में पहुंचा| माँ कामाख्या के मंदिर में जाति, धर्म और अन्य किसी भेदभाव के सभी कन्याए वन्दनिये है| वहां अमीर और गरीब सभी की लड़कियों को एक साथ पूजा में भाग लेने दिया जाता है| किसी भी प्रकार का भेद भाव करने से पूजा असफल मानी जाती है| मंदिर के बाहर दूर दराज से आये साधक अपनी सिद्धियों की साधना में व्यस्त रहते है|
 
    उधर रंगा अपने प्यार को न पाने पर टूट चूका था| वह दर दर को ठोकर खाने लगा| अन्त में वह एक साधक की शरण में आया| रंगा ने उस साधक की बहूत सेवा की| सेवा से खुश हो साधक ने उसे अपना चेला बनाया और तंत्र साधना सिखाई| रंगा तंत्र साधना में निपुण हो चुका था| अन्य साधको की तरह वह भी अपनी तन्त्र विद्या का पुनर्मार्जन कर रहा था| तभी उसकी नजर काजी पर पड़ी| काजी और रंगा एक दूसरे को देख काफी खुश हुए| काजी अपने पर लगे प्रतिबन्ध भूल चुकी थी| इस खुल्मखुल्ला प्यार से कर्बी को बहुत ग़ुस्सा आ गया| उसने काजी को घर में ला कर जंजीरों में बांध दिया| रंगा लाल चिड़िया बन कर काजी की खिड़की से अन्दर प्रवेश कर गया| और काजी से प्यार भरी बातें कर उस को ढाढस बंधाया|काजी किसी से बात कर रही थी| कर्बी ने बार बार उस से पूछा की वह किस से बतिया रही थी| कुछ भी ना बताने पर काजी को काफी यातनाये दी गई| अब रंगा ने क़ाज़ी के घर आना बंद कर दिया|वह रात्री को क़ाज़ी को अपनी तंत्र विद्या के प्रभाव से तितली बना कर घर से बाहर निकलता और दोनों जंगल में रंगा की कुटिया में अपनी राते बिताने लगे|
 
    कुछ समय के बाद काजी बीमार हो गयी और जांच पर पाया गया की क़ाज़ी गर्भवती हो गई है| बिन ब्याही लड़की के गर्भवती होने पर पूरे गाँव में भूचाल सा  आ गया| बदनामी के डर से कर्बी ने काजी को मारने की योजना बनाई| समय रहते रंगा को इस बात का पता चल गया और इस बात को पूरे गाँव में फैला दिया| पूरे गाँव में इस बात का विरोध होने लगा| काजी ने परिस्थियों को भांप कर वहां से भाग जाना ही उचित समझा| वह दिन के उजाले में ही घर से निकल पड़ी| किसी को उस का विरोध करने की हिम्मत नहीं हुई| वह घने जंगल में चलती गई और आगे उसे रंगा मिल गया|कर्बी और उसके सभी आदमियों ने दोनों को कई दिनों तक तलास की परन्तु वे कही पर नहीं मिले|
 
    कुछ समय बाद समाचार मिला की काजी ने एक लड़के को जन्म दिया है| सुबह और सांयकाल सच्चे प्रेमियों को वे दोनों घने जंगल में घूमते मिल जाते हैं| अब घना जंगल ही उन का निवास स्थान बन गया था| उन दोनों के नाम पर ही इस जंगल को काजीरंगा के नाम से जाना जाने लगा| कुछ समय बाद कर्बी ने पुनः ज्योतिषी से मुलाक़ात की | ज्योतिषी ने बताया की तुम काजी का लड़का अपने पास लाओगे| इस उम्मीद में कर्बी रोज जंगल में जाने लगा| एक दिन उसे एक महात्मा जंगल में मिले| उनको अपनी व्यथा बताई| महात्मा ने बताया की कल प्रातः काल मोरा धनश्री नदी  की पूजा अर्चना करो और उसमें मेरे दिए हुए पुष्पों को विसर्जित करो| वहां पर तुम्हें इच्छित फल अवश्य मिलेगा|
 
    कर्बी ने महात्मा के बताये अनुसार  मोरा धनश्री नदी की पूजा अर्चना के साथ फूलो का विसर्जन किया और काजी रंगा के प्रति किये अपने दुरव्यवाहार के लिए क्षमा याचना की|इसके बाद कर्बी को नदी के दूसरे किनारे काजी और रंगा अपने बेटे के साथ खड़े दिखाई दिए|कर्बी ने उनको घर पर चलने को कहा| परन्तु उनहोंने बच्चा उनको सौंप दिया और कहा आज से यह आप के हवाले है| मोरा धनश्री नदी  के पास आपको मिला है अतः आज से इस का नाम धनश्री होगा| आज से जो इस नदी पर आ कर पूजा अर्चना करेगा उस का प्यार परवान चढ़ेगा| काजीरंगा हमारे दोनों के नाम से जाना जाएगा| तभी से यह काजीरंगा के नाम से जाना जाने लगा| 
 
    अनवी इस कहानी से बहुत प्रभावित हुई| उसने मोरा धनश्री नदी  पर जाने की इच्छा जताई|लाल चिड़िया उसको मोरा धनश्री नदी  के तट पर ले गई |वहां के प्राक्रतिक दृश्य देख कर वह काफी प्रशन्न हो रही थी| उसने मोरा धनश्री नदी  की पूजा अर्चना की | थोड़ी ही देर में नदी के दूसरे तट पर तेज हवा के साथ बादलों का झोंका आया और उसे नदी के उस पार क्काजी और रंगा दिखाई दिए| वह नदी पार कर उन के पास गयी और शान्ति से उन की प्रेम कहानी सुनी |
 
    काजी कहने लगी; बहुत समय पहले की बात है हमारा गाँव पहाड़ी की तलहटी में हुआ करता था |एक दिन अचानक तेज बारिस आई और हमारे घासफूस के घर पानी के प्रवाह में बह गए|सामान की कोई सुधबुध नहीं थी|पशु और प्राणी सभी लाल प्रवाह में बह रहे थे| मैं भी पानी में बह रही थी| बचाव का कोई उपाय नहीं सूझ रहा था|अचानक एक युवक ने मुझे पानी में बहते देखा और मुझे बचने के लिए नदी में कूद पड़ा| काफी संघर्ष के बाद हम दोनो पानी से बाहर निकल पाए| परंतू हमारा सब कुछ लुट चुका था|हमारा दोनों का घर परिवार कुछ नहीं बचा था| हमने प्रभु की नियति समझ इसे स्वीकार किया| नए सिरे से बांस का एक घर बनाया| जंगल में उपलब्ध कन्दमूल खा कर गुजारा किया| हमारे दिन ठीक से गुजर रहे थे| 
 
    अभी हम एक दूसरे को अच्छे से समझ भी नहीं पाए थे की प्रकृति का एक कहर और हम पर टूटा| हाथियों के एक झुण्ड में लड़ाई हो गई और उसमें हमारा सब कुछ स्वाह हो गया| बड़ी मुसकिल से हमने अपनी जान बचाई|जंगली जानवरों का खतरा हमेशा बना रहता था|उस के बचाव के लिए हमने घने पेड़ों के मध्य जमीन में एक गुफा बनाई और उसको लकड़ियों और घास फूस से ढक दिया|उसके ऊपर हमने एक बांस की एक झोपड़ी बनाई| जंगल में रहना हम सीख चुके थे|हम दोनों मजदूरी करने लगे|जिससे घर का जरूरी सामन जुटाने लगे|एक बार पुनः हमारी गृहस्त की गाडी पटरी पर आई थी|अचानक एक भरी तूफ़ान में आस पास के पेड़ टूट कर गिर रहे थे|हमारी झोपड़ी भी टूट चुकी थी|लेकिन गुफा में छुप कर हमने अपनी जान बचाई|
 

    हमने अपना जरुरी सामान उठाया और काम और सुरक्षित आवास की तलास में निकल पड़े| घूमते घूमते अचानक हमें एक पुराना भवन दिखाई दिया|पास आने पर पता चला की वह कोई मंदिर था| लेकिन अब खंडहर बन चुका था |साल के घने पेड़ों के मध्य एक बौध मंदिर में हमने अपना आश्रय बनाया| दिन में हम मंदिर में रहते और रात को मंदिर की छत पर छुप कर सोते| हमारे वहां रहने से मंदिर की साफ़ सफाई होने लगी| मंदिर के आहाते में ही हम अपना खाना बनाने और दिन में बैठने उठाने की व्यवस्था कर ली थी|

Sunday, 9 September 2018

नमेरी राष्ट्रीय उद्यान

 नमेरी राष्ट्रीय उद्यान


 

नमेरी राष्ट्रीय उद्यान असम राज्य के शोणितपुर ज़िले में स्थित एक राष्ट्रीय उद्यान है।यह पूर्वी हिमालय के गिरिपीठ में स्थित है |तेजपुर से 35 किलोमीटर की दूरी पर स्थित, नमेरी राष्ट्रीय उद्यान सोनितपुर जिले के अंतर्गत आता है। राष्ट्रीय पार्क लगभग 200 वर्ग कि.मी क्षेत्र में फैला हुआ है। इसकी उत्तरी सीमायें अरुणाचल प्रदेश के पाखुइ वन्यजीव अभयारण्य के साथ जुड़ी हुई हैं। निचले हिमालय की तलहटी पर स्थित नमेरी राष्ट्रीय उद्यान विविध वनस्पतियों और जीवों की कई प्रजातियों का आश्रय स्थल है। पार्क में हाथी बड़ी संख्या में हैं, जबकि यह तेंदुए, जंगली काले भैंसे, काले भालू जंगली सूअर, कैप्ड लंगूर आदि का भी निवास स्थल है। पर्यटक यहां हार्नबिल्स, प्लोवर, वुड बतख, पतेना और बकवादी जैसे पक्षियों को देखने का भी आनंद ले सकते हैं। पार्क के अंदर प्रवाहित होने वाली कई छोटी छोटी नदियों का भी पर्यटक लुत्फ उठा सकते हैं। यह स्थान मछली पकड़ने के लिए भी काफी लोकप्रिय है क्योंकि मछली पकड़ने के लिए एक आदर्श स्थल है। इस पार्क की यात्रा करने के लिए सबसे अच्छा समय नवम्बर से मई तक है। पर्यटक गुवाहाटी (198 किलोमीटर) से सीधे पार्क पहुंच सकते हैं या रास्ते में तेजपुर में ठहराव लेकर भी यहां पहुंचा जा सकता है। 


दौड़ती भागती जिंदगी से दो पल आराम के कौन नहीं चाहता हैं और इसके लिए लोग क्या कुछ नहीं करते हैं, कई लोग योगा करते हैं तो कई पहाड़ो पर घूमने जाते हैं, लेकिन आज हम आपको एक ऐसी जगह के बारें में बताने जा रहे हैं जहां जाकर ना सिर्फ आप तरो ताजा महसूस करेंगे बल्कि प्राकृति के और भी करीब आ जाएंगे यहां पेड़ों की 600 से अधिक प्रजातियां पाई जाती हैं। असम के तेजपुर से 35 किलोमीटर की दूरी पर स्थित सोनीपुर जिले में है| यहां आप को हाथी देखने को मिलेंगे। इस पार्क में पक्षियों की ढेरों प्रजातियां पाई जाती हैं|इस क्षेत्र में लिया-भोरोली और इसकी सहायक नदियों (दिजी,दिने, दोइगुरुंग, नामेरी, दिकोरै,खरी आदि) का जाल फैला हुआ है|वर्षा ऋतू में कुछ झील भी दिखाई देती है| 

यहाँ पर पंखों वाले जंगली बतख, महान चितकबरा हॉर्नबिल, माल्यार्पण हॉर्नबिल, रुफौस चुम्मा हॉर्नबिल, काले सारस, इबिस बिल, बड़ी सीटी चैती, आम मेर्गेर्न्सेर, राजा गिद्ध, लंबे बिल की अंगूठी प्लोवर, खल्लेज तीतर, हिल मैना, पिन पूंछ हरे कबूतर, हिमालयन चितकबरा हॉर्नबिल आदि पक्षी पाए जाते है| सरी सर्प:- किंग कोबरा, कोबरा, पिट वाइपर, रसेल वाइपर, बैंडेड क्रेट, पायथन, राइट सांप, असम रूफ टर्टल, मलयान बॉक्स कछुए, कीलड बॉक्स कछुए, एशियाई पत्ता कछुए, संकीर्ण मुलायम शेलड कछुए, भारतीय मुलायम शेलड कछुए, आदि पाए जाते हैं|
मछलियाँ:- यहाँ पर गोल्डन महासेर, शार्ट गिल महासेर, सिल्गारिया, आदि किंगफिशर, थ्री टूड किंगफिशर, फेयरली ब्लू बर्ड इत्यादि मछलियाँ पाई जाती है|

टाइगर, तेंदुए, ब्लैक पैंथर, क्लाउड तेंदुए, लेडी बिल्लियों, स्लोथ बीयर, हिमालयी ब्लैक बीयर, हाथी, भारतीय बाइसन, ढोल, सांबर, बार्किंग हिरण, कुत्ते हिरण, फॉक्स, हिसपिद हरे, भारतीय हरे, कैप्ड लैंगुर, धीमी लॉरीस, असमिया मैकक, रीसस मैकक, हिमालयी पीले थ्रोटेड मार्टिन, मलयान विशाल गिलहरी, फ्लाइंग गिलहरी, जंगली सुअर इत्यादि जंगली पशु पाए जाते है।

उत्तर पूर्व भारत की तितलिया:-पूर्वी असम में जंगल का निवास उष्णकटिबंधीय सदाबहार, अर्ध-सदाबहार, असम घाटी गीले सदाबहार जंगल, नम पर्णपाती जंगलों और बेंत घास के मैदान से गन्ना और बांस ब्रेक और खुले घास के मैदानों के झरनों से बना है जो तितलियों के लिए उपयुक्त आवास है। तितलियों विभिन्न जलवायु क्षेत्र और आवास में प्रचलित सबसे विविध जीवों में से एक हैं|कई अन्य प्राणियों के विपरीत तितलियों, हिंसक हमले से लड़ने के लिए डंक या काटने नहीं कर सकते हैं। इसलिए, शिकारियों से बचने के लिए, तितलियों ने अंडा से वयस्क स्तर तक, विभिन्न सुरक्षात्मक अनुकूलन विकसित किए हैं। गर्म खून वाले जानवरों के विपरीत तितलियों में लगातार शरीर का तापमान नहीं होता है। उनका शरीर का तापमान आस-पास के परिवेश के तापमान पर निर्भर करता है।कम तापमान उनके शारीरिक प्रक्रिया को धीमा कर देता है। तितलियों को अपने तापमान को नियंत्रित करने की आवश्यकता होती है और इसलिए वे सूरज की रोशनी में अपने तापमान को कम करने के लिए एक पत्ते के नीचे छुप सकती हैं।

यह क्षेत्र तितली उत्साही के लिए मक्का है। इस क्षेत्र में कुल 1501 प्रजातियों में से 50 प्रतिशत से अधिक पाई जाती है। नामरी नेशनल पार्क में अब तक दर्ज की गई प्रजातियां पापीलिओनिडे (14 स्पीसी), निम्फालिडे (62 प्रजातियां), पेरिडे (17 प्रजातियां), लाइकाइडेडे (1 9 प्रजातियां) और हेस्परिडे (12 स्पीसी) हैं।

वनस्पति एवं पशुवर्ग :-नमेरी का निवास उष्णकटिबंधीय सदाबहार, अर्द्ध सदाबहार, नमक पर्णपाती जंगलों से बना है जो बेंत और बांस ब्रेक और नदियों के साथ खुले घास के मैदान के संकीर्ण पट्टियों से बना है। घास के मैदानो में पार्क के कुल क्षेत्रफल का 10% से भी कम है, जबकि अर्द्ध सदाबहार और नम पर्णपाती प्रजातियां क्षेत्र पर हावी होती हैं। कुछ उल्लेखनीय प्रजातियां गमारी,तिताचोपा,अमरी , बोगिपोमा,अजर, उरीम पोमा, भेलौ, अग्रू, रुद्राक्ष, बोनजोलोकिया, हैटिपोलिया अखाकान, अहलॉक, नाहोर, सिया नाहर, सिमुल, बोन्सम आदि हैं। ऑरोचिड्स में डेंडरोबियम, सिम्बिडियम, लेडीज़ स्लीपर इत्यादि शामिल हैं। ट्री फर्न, लिआनास, क्रीपर्स इस जंगल की कुछ विशेषताओं हैं।सबसे मूल्यवान और सबसे महत्वपूर्ण खोज व्हाइट विंगड वुड डक है, जिसकी नामांकन नेमेररी में 1995 में आधिकारिक तौर पर पुष्टि की थी। अब तक पार्क में 315 एवियन प्रजातियां दर्ज की गई हैं।

कैसे पहुंचे:- गुवाहाटी हवाई अड्डे पर पहुंचे और सड़क से नमेररी पहुंचे। नियमित उड़ान भारतीय गुवाहाटी-बागडोग्रा, कोलकाता, नई दिल्ली, मुंबई, बैंगलोर, चेन्नई, जयपुर, हैदराबाद, गोवा, डिब्रूगढ़, जोरहाट से भारतीय एयरलाइंस (एयर इंडिया), जेट एयरवेज, जेटलाइट, इंडिगो, और गो एयर संचालित होती है। । ड्रुकेयर गुवाहाटी के साथ सप्ताह में दो बार बैंकाक और पारो (भूटान) को जोड़ता है।

तेजपुर हवाई अड्डे को सैलोनिबरी हवाई अड्डे के रूप में भी जाना जाता है, जो निकटतम हवाई अड्डा है जो शहर के केंद्र से बलिपारा तक सड़क पर 8 किलोमीटर दूर है। तेजपुर में एयरफील्ड का निर्माण १९४२ में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश रॉयल इंडियन वायुसेना द्वारा किया गया था। इसका इस्तेमाल 7 वें बमबारी समूह द्वारा बी -24 लाइबेरेटर भारी बॉम्बर बेस के रूप में संयुक्त राज्य आर्मी एयर फोर्स दसवीं वायुसेना द्वारा किया गया था। युद्ध के बाद, इसे बाद में में एक पूर्ण वायुसेना बेस में विकसित किया गया। इसकी स्थापना के बाद से यह भारत के पूर्वोत्तर में सबसे सक्रिय अड्डों में से एक रहा है। हालांकि, तेजपुर हवाई अड्डे से घरेलू उड़ानें वापस ले ली गई हैं।

कार्य कलाप :- वन अधिकारियों और जंगल गार्ड के साथ आयोजित मोटी जंगल और सूखे नदी के किनारे के माध्यम से प्रकृति के निशान, पक्षी आदि आगंतुकों को देखने का मौका प्रदान करते हैं। पक्षी विविध और प्रचुर मात्रा में है जिसमें लगभग 400 प्रजातियां हमेशा मिल जायेगी । नमरी के सबसे महत्वपूर्ण एवियन निवासी व्हाइट-पंख वाले बतख हैं। अन्य प्रमुख पक्षियों में व्हाइट-गालड पार्ट्रिज, ग्रेट, माली, और रूफस-गर्दन हॉर्नबिल्स, रुड्डी, ब्लू-ईयर और ओरिएंटल बौना शामिल हैं| किंगफिशर, ओरिएंटल हॉबी, अमूर फाल्कन, जेरडन और ब्लैक बाजा, पलास, ग्रे-हेड, और लेसर फिश ईगल्स, सिल्वर समर्थित बैकलेट, माउंटेन इंपीरियल कबूतर, ब्लू-नेपड पिट्टा, स्लेण्डर-बिल ओरिओल, हिल ब्लू फ्लाईकैचर, व्हाइट-क्राउन फोर्कटेल, सुल्तान टिट, ब्लैक-बेलेड टर्न, जेरडन बाब्बलर, रूफस बैकड सिबिया, पीले-बेलेड फ्लॉवरपेकर, रेड-थ्रोटेड पिपिट, लांग-बिल प्लोवर और इबिस्बिल।

पूरे परिवार के लिए जिया-भोरोली नदी के सौम्य रैपिड्स में राफ्टिंग अनिवार्य रूप से आनंददायक यात्राएं हैं। नदी-राफ्टिंग इबिसबिल और लांग-बिल प्लोवर जैसे पक्षियों को देखने का एक लोकप्रिय और सुखद तरीका है। नदी पर पार्क के दक्षिण पूर्व में नदी राफ्टिंग की अनुमति है-राफ्टिंग आमतौर पर 13 किमी शुरू होती है। अपस्ट्रीम और बिना रुकावट के पूरा होने में लगभग 3 घंटे लगते हैं।



इतनी प्रशंशा सुनने के बाद अनवी का मन भी नमेरी राष्ट्रीय उद्यान घुमाने को हुआ| उसने अपनी छुट्टियों का कार्यक्रम बनाया | पालम अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से उड़ान भरने के बाद जहाज़ की खिड़की से नीचे झाँका तो दिल्ली काले धुएं की गहरी चादर में लिपटी थी। धीरे धीरे धुआँ छटने लगा और उत्तरी क्षितिज पर धौलाधार के बर्फीले पहाड़ चमकने लगे। शहर की भीड़-भाड़, गन्दगी और भागदौड़ भरी जिन्दगी से मुक्ति का सुखद अहसास। शायद बादलों के पार की हिम-मण्डित रचनाएँ एक रहस्यमय सँसार का आभास दे रही है जिसमें अपनी काया से बाहर विचरण करने वाले और पक्षियों से बात करने वाले हज़ार-साला साधु निवास करते हैं|अचानक बादलों में मुझे एक मानव आकृति दिखाई दी | मुझे ऐसा आभास हुआ जैसे वश आक्रति मुझे बाला रही हो| गोर से देखने पर कभी शिबांगी, कभी मेरी विद्यालय में मैडम और कभी मेरी अन्य सहेलियों जैसी आकृति दिखाई देती थी| अजब झोल है। जहाज़ की खिड़की से हरयाली और बरसाती बहाव के मार्ग दिखने लगे हैं। पूर्वोत्तर भारत की मेरी यह यात्रा परिचित सी लग रही थी । क्रू ने खिला-पिला कर उनके साथ यात्रा करने के लिए धन्यवाद दिया। अब गौहाटी उतरने के बाद राष्ट्रीय राजमार्ग 27 से तेजपुर और तेज़पुर से नामेरी राष्ट्रीय उद्यान। सड़क किनारे नारियल पानी और बाँस के सामान की दुकाने थी । साफ़ हवा और हरे-सुनहरे खेतमन मोहक लग रहे थे । हवाई जहाज़ का सफर समय तो बचाता है पर सैलानियों को सुख सड़क ही देती है। दो घंटे कैसे बीत गए यह पता ही नहीं चला| 



पूरे रास्ते शिबांगी मुझे बताती रही की असम में और कहाँ क्या देखे| तेजपुर भी अपने अंदर ऐतिहासिक स्‍थलों को समेटे हुए है। ब्रह्मपुत्र नदी के उत्तरी किनारे पर स्थित यह शहर एक बेहद शांत जगह है। यहां पर बड़ी संख्‍या में पयर्टक आते हैं। तेजपुर में अग्निगढ़, कोलिया भोमोरा सेतु, पदम पुखुरी, महाभैरव मंदिर, हलेश्वर मंदिर आदि घूमने की खास जगहों में शामिल हैं। डिगबोई नगर छोटा है लेकिन आकृषण के मामले में कम नही है। 19वीं सदी के अंत में यहां कच्चे तेल की खोज हुई थी। इसलिए इसे असम की तेल नगरी के रूप में भी जाना जाता है। यहां नामेरी राष्ट्रीय उद्यान, बुरा-चापोरी वन्यजीव अभयारण्य, नागशंकर मंदिर और केतकेश्वर देवल आदि घूमने की जगहें हैं।दिफू भी असम के छोटे शहरों में गिना जाता है लेकिन इसकी भी जि‍तनी तारीफ की जाए कम है। दिफू में भी घूमने की एक से बढ़कर एक खूबसूरत जगहे हैं। यहां पर बॉटनिकल गार्डन, जिला संग्रहालय, अर्बोरेटम, तरलांगो सांस्कृतिक केंद्र जैसी जगहें घूमने के स्‍थान हैं। जहां बड़ी संख्‍या में पयर्टक आते हैं।गोलाघाट भी यहां के पयर्टन स्‍थलों में एक है क्‍योंकी यहां काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान स्‍थ‍ित है। यूनेस्को के विश्व विरासत में शामि‍ल यह उद्यान गैंडों के लिए प्रसि‍द्ध है। यहां हाथी, एशियाई भैंसे, धमाचौकड़ी करते हरिन और बाघ भी देखने को मिल जाते हैं। वहीं रंग-बिरंगे पक्षी भी पयर्टकों को आकर्ष‍ित करते हैं।सुरमा नदी पर स्थित सिलचर भी असम की शान को बढ़ाने वाले स्‍थलों में शामिल हैं। यहां चाय के बागानों के अलावा चावल की खेती भी होती है। सिलचर में पयर्टकों को घूमने के लिए भुवन मंदिर, कंचन कांति काली मंदिर, खासपुर, मणि हरण सुरंग, गांधी बाग के अलावा इस्कॉन मंदिर आदि हैं।असम का डिब्रूगढ़ इलाका भी बहुत ही खूबसूरत है। असम के डिब्रूगढ़ में ब्रम्‍हपुत्र नदी के किनारे शाम के समय डूबता हुआ सूरज देखना पयर्टकों को काफी अच्‍छा लगता है। इसके अलावा डिब्रूगढ़ में घूमने के लिए दीन्‍जोय सतरा, दीहिंग सतरा और कोलीआई थान जैसे क‍ई दूसरे ऐतिहासिक व प्राचीन स्‍थल बने है| 



घने जँगलों में पर्यटकों को एक सुरक्षित दायरे तक ही प्रवेश की अनुमति मिलती है। उसके आगे जाने के लिए वन विभाग की कृपा ही एकलौता मार्ग है। यदि जँगल ही देखना है तो नमदफा जाओ ! तो नमदफा राष्ट्रीय उद्यान का मानस पक्का हुआ और सुदूर पूर्वोत्तर का कार्यक्रम बन गया और हम नामेरी राष्ट्रीय उद्यानपहुँच गए| हमारे रुकने की व्यवस्था नामेरी के नजदीक एक आदिवासी गाँव थी। तेज़पुर से इस गाँव का रास्ता करीब 38 किलोमीटर है | अरुणांचल सीमा वहाँ से मात्र दस किलोमीटर की दूरी पर है। वहाँ खाने को क्या मिलेगा कैसा मिलेगा को लेकर हम थोड़ा आशंकित थे। आगे कोई और कस्बा नहीं है इसलिए कुछ फल और नमकीन हमने तेज़पुर से ख़रीदे।पूर्वांचल में सर्दियों की साँझ चार बजे ही ढल आती है। गाँव पहुँचे तो अच्छी भली चाँदनी रात घिर आयी थी। छोटे से गाँव में मध्यम रौशनी में हमारा प्रवेश हुआ। हरी घास के बीच में लकड़ी ओर बाँस के छप्पर और झोपडिया बनी हुई थी। एक बड़े से पेड़ के नीचे टेंट लगा कर हमारे ठहरने की व्यवस्था की हुई थी जिसमें आराम दायक बिस्तर था । लॉन के बीच जलते अलाव के इर्द-गिर्द आदिवासियों का समूह बैठा था। एक तरफ रसोई में अच्छा सस्ता शाकाहारी खाना बन रहा था । हम भी खाना खा कर अलाव के पास घंटों बैठे बतियाते रहे । सारे दिन के सफर के बाद भी थकान का नामोनिशां नहीं था। सर्दियों की चादनी रातें यूँ ही बहुत दिलक़श होती हैं पेड़ पौधों की आकृतियाँ मन के मुताबिक आकार ले रही थी|और तारों भरी रात , जँगल की खुशबू और लकड़ियों की आँच मन को दुलाये मान कर रही थी ।लेकिन सुबह छः बजे जल्दी तैयार हो कर नामेरी के घने जँगल में जाना था| पशु-पक्षियोँ की भी दिनचर्या होती है और उन्हें देखना हो तो प्रातःकाल या शाम का समय सही होता है। वे सुबह-शाम भोजन पानी के लिए खुले में निकलते हैं और हल्का दिन चढ़ते ही अपने घरों में लौट जाते हैं। 



बिस्तर से सिर टिकाते ही नीँद ने आ घेरा।आँख खुली पाँच बजे। तैयार हो चाय पी इतने में सूरज की रौशनी फूट पड़ी। कैंप के पेड़ों पर बन्दरों की धमाचौकड़ी चालू हो गयी। मेरे सामने के घर वाली आदिवासी महिला पक्षी की आवाज़ निकालती है जिसके जवाब में कहीं से कोई पक्षी जवाब देता है। अचानक से एक ग्रेट हार्नबिल सन्न से निकलता है | परंतू मेरे पास मेरा कैमरा नहीं था । मैंने अवसर गंवाया और पूरी यात्रा में मैं हार्नबिल का एक भी फोटो नहीं ले पायी। फारेस्ट गार्ड के ऑफिस से जँगल का पास बनवा कर लाती हूँ। नामेरी के जँगल में बिना गार्ड जाने की अनुमति नहीं है।गाँव से डेढ़ किलोमीटर दूरी पर ही गाड़ी उतार देती है | एक शांत स्वच्छ नीले जल की धारा के तट पर जिस का नाम -जिया भोरेली। कहीं गन्दगी या प्रदूषण का नामो -निशाँ नहीं था । उस पार घना जँगल पहाड़ बर्फीली चोटियाँ दिखाई डे रही थी । चप्पू वाली नाव से नदी की धारा पार की तो सूखी रेत पर चमकते के मोटे कणों पर हाथियों के पैरों के निशान दिखाई दिए डे रहे थे । मल्लाहों के ख्याल से हाथियों को पानी पी कर गए ज्यादा समय नहीं हुआ। 



नदी पार का जँगल बहुत घना है। सैलानियों को मात्र दो ट्रेल पर जाने की अनुमति है - एक सात किलोमीटर लंबी और दूसरी तेरह किलोमीटर लम्बी। नामेरी की प्रसिद्ध 'वाइट विंग वुड डक' और 'सुल्तान बर्ड' देखने जाना हो तो छोटी ट्रेल जाना होता है। बहुत सारी अब तक अनदेखी लाल-पीली-हरी-काली चिड़िया देखते हुए हम चुपचाप आगे बढ़ते हैं | हमें बाक़ायदा चुप रहने की हिदायत के साथ आगे बढ़ते रहने और दबे पाँव तालाब के किनारे पहुँचे लेकिन हमारे पैरों की आवाज़ का आभास उन्हें फिर भी हो गया था । हम उसके दूर होते परों की एक झलक भर देख पाए। वापसी में नदी किनारे की ट्रेल पर बाघ के पँजों के ताज़ा निशान और मिटटी पर कुछ घसीटे जाने के निशान दिखाई पड़े। शायद अभी अभी कोई बाघ शिकार घसीट कर ले गया था। हमने गार्ड से मिन्नतें शुरू कर दी की हमें ओई बाघ दिखा दे | बतख तो तूने दिखाये नहीं। उसने अपने मोबाइल पर एक गार्ड पर बाघ के झपटने की फोटो दिखाई, इसके बाद किसीने बाघ दिखाने का आग्रह नहीं किया । अब तो बहस का कोई सवाल ही न था। ताज़ा शिकार के साथ बाघ बहुत आक्रामक होता है। 

ट्रेल के अन्तिम सिरे पर चाय की दुकान पर बैठ कर हमने चाय पी। बतख ठीक से न दिख पाना मन में थोड़ा असन्तोष हो रहा था, पर विशाल गिलहरी के मामले में हम भाग्यशाली रहे।गार्ड ने जब इशारा किया तो टहनियों के बीच से उसकी बड़ी पूँछ दिखाई दे रही थी। इस आकर की गिलहरी देश में नामेरी में ही पायी जाती है। वापिस गाँव लौटे तो ग्यारह बज चुके थे । थकान काफी हो गयी थी। खाना खा कर सोये तो चार बजे नींद खुली। शाम की जँगल सफारी का समय निकल चुका था। तय किया कि ढलती शाम का सिंदूर जिया भोरेली पर बिखरते देखा जाये। हमने ड्राइवर से आग्रह किया कि हमें नदी किनारे किसी और जगह ले जाये। ले तो जाऊँगा पर उधर थोड़ा खतरा है जगह थोड़ा अंदर में है और यह बोडो उग्रवादियों का इलाका है| काफी उहापोह के बाद कोई बीस किलोमीटर जंगल के अन्दर के भाग की यात्रा के बाद हम फिर जिया भोरेली के तट पर पहुंचे । पास में सेना का कैंप था। सेना की यूनिट पास होने के कारण हम अपने आप को काफी सुरक्षित महसूस कर रहे थे| नदी किनारे एक मन्दिर था जहाँ सेना की तरफ से प्रसाद वितरण किया जा रहा था । धीरे धीरे नदी पर्वत आसमाँ सब सुरमयी हो चले और पानी पर जैसे केसर बिखर गया हो । नदी के पानी में पैर डाल धीरे धीरे डूबती साँझी में मैं भी ढलती जा रही थी । मन्दिर में आये जवान सड़क पर नाचते गाते जा रहे । 

आज सुबह निकलते सात बज गए। जिया भोरेली पार कर लम्बी ट्रेल का रुख किया तो पैर मशीन की तरह चल रहे थे। मन में जच गयी कि आज कुछ नहीं दिखाई देने वाला। कोई आधा किलोमीटर ही चले होंगे कि गार्ड ने आवाज़ ना करने का इशारा किया। नज़र उठायी तो सामने खुले मैदान में एक हथिनी अपने छोटे से बच्चे के साथ चर रही थी। बच्चा छोटा हो तो हथिनी बहुत आक्रामक हो जाती है। हमें बहुत धीमे हल्के पैरों से मैदान पार करना था। एक तरफ हथिनी थी और दूसरी तरफ सिर की ऊँचाई जितनी घास। 'इसमें बाघ हो सकता है ?' मैंने गार्ड से फुसफुसा कर पूछा। उसने हामी में सिर हिला दिया। अब एक तरफ बाघ का भय और दूसरी तरफ हथिनी ने हमें देख लिया था। जँगल का थ्रिल अब समझ आ रहा था। हथिनी ने तमाम कोशिश के बावजूद हमें देख लिया था। उसने अपना बच्चा हमारी नज़र से छिपा लिया। उसकी तरफ देखते देखते लगभग भाग कर ही मैदान पार किया। मैदान खत्म कर फिर बड़े पेड़ों का जँगल आया तो साँसे सामान्य हुईं। 

सुबह का आलस्य अब पूरी तरह दूर हो चूका था । रँग बिरंगी चिड़ियों की चहचाहट के बीच पहली वॉच टावर पहुँचे तो जँगल की सघनता के कारण हरियाली से परे कुछ दिखाई न दिया। यहाँ से दूसरी वॉच टावर तक पहुँचे जहाँ एक साफ़ सुथरी क्षीण नाला बह रहा था। कुछ देर बच्चों की तरह पानी में खेलने के बाद गार्ड ने वापसी का फरमान जारी कर दिया। उसकी भी ड्यूटी का समय है ! 

अनमने मन से वापस जिया भोरेली के किनारे लौटे। किस्मत बड़ी बलवान थी। नदी के बीच धार में एक हाथी मस्ती के साथ डुबकियाँ लगा कर नहा रहा था। खूब तैराकी करने के बाद वह सूंड से अपने शरीर पर पानी उछलता दूसरे किनारे चला गया। हम मुग्ध भाव से उसे देखते रहे और फोटो लेते रहे। 

नामेरी का जँगल बेहद घना, खूबसूरत और जीवन से भरपूर है। पक्षियों और वनस्पति की अनेकों दुर्लभ प्रजातियाँ यहाँ विद्यमान हैं। प्रकृति के शौकीनों के लिए यह किसी स्वर्ग से कम नहीं। वापस तो लौटना ही था| गाँव में वापिस आ कर थोड़े आराम करने के बाद खाना खाया और आराम करने लगी| सुस्ता ही रही थी कभी नींद की झपकी आ रही उसी समय सामने वाली आदिवासी महिला आ गई| वह पूछने लगी क्या जंगल में बाघ देखने को मिला| मेने कहा नहीं| लम्बी सांस लेने के बाद वह कहने लगी यहाँ जंगली जानवरों के अलावा उग्रवादियों और बुरी आत्माओं का भी डर रहता है| वह कहने लगी आपने जहाँ सेना का कैंप देखा है ना वहां कभी २०-२५ घरों का एक गाँव हुआ करता था|उग्रवादियों का विरोध करने पर उग्रवादियों ने पुरे गाँव ओ आग लगा दी | २५ के लगभग आदि, औरते, और बच्चे ज़िंदा ही जल कर मर गये थे| उबकी आत्मा यही पर भटकती रहती है|गांव वालों के मन में सुरक्षा की भावना बनी रहे इसलिए यहाँ पर सेना का अस्थाई कैंप बना दिया है| इन के डर से अब उग्रवादी भी इधर नहीं आते|एक बार एक पर्यटक दल पर एक बाघ ने हमला कर दिया था | चालक किसी तरह यात्रियों कोटो बचा लाया परन्तु इस भाग दोड में एक बच्चा वहीँ पर गिर गया| एक शेरनी उसे मुह में पकड़ कर उठा ले गयी| शेरनी का मातृतव जाग उठा और उसने बच्चे खो खाया नहीं| कुछ दिनों बाद वह उस बच्चे को इस गाँव के पास छोड़ गई| एक वन गार्ड ने बच्चे को पाला पोषा और पढाया| कुछ दिन शेरनी ने पाला था इस लिए उसका नाम शेरू ही रखा गया| 

बच्चा किस्मत का धनी था|पढ़ लिख कर वह सेना की इसी यूनिट में आ गया|एक दिन वह सेना की गाड़ी से गस्त लगा रहा था, बीच रास्ते एक भरी पेड़ गिर गया था| उस रास्ते गाडी आगे नहीं जा सकती थी| गाडी को वापिस घुमाते समय संतुलन बिगड़ने पर गाडी भी उलट गयी थी| उसके दो साथियों की मौके पर ही मौत हो गयी थी| जंगल में भारी वर्षा ह रही थी|मदद की कोई आस नहीं थी | नजदीक ही घने जंगल में एक पुराना लेकिन भव्या मंदिर था|रखरखाव ने होने क्र कारण वह जर्जर हो चूका था| पूजा पाठ तो कई सालों से नहीं हुई थी| वह मंदिर के ऊपर के हिस्से में छुपा कर बैठ गया| तभी उसे बाघ की आवाज सुनाई दी| बाघ उसकी गाडी के पास आया और गाडी के नीचे दबे शवों को खाने लगा| अचानक मंदिर से एक औरत बाहर आई और उसको देख कर शेर वहां से वापिस चला गया |शेर के जाने के बाद शेरू नीचे आया और उसने सारा मंदिर छान मारा परन्तु वह औरत उसको कहीं दिखाई दी|सुबह जब वह उठा तो उसने देखा की उशी गाडी रास्ते में सीधी खड़ी थी उसके साथी गाडी की पिछली सीट पर सो रहे थे | उनको कोई हानि नहीं हुई थी| वह अपनी गाडी ले कर वापिस यूनिट में आया और रात का सारा वृतांत कह सुनाया| उसके साथ के दो साथियों को इतना तो ध्यान था की आगे रास्ते में पेड़ पडा हुआ था और रास्ता ना होने के कारण शेरू गाडी वापिस कर रहा था| और इसी दौरान गाडी उलट गई थी| इसके बाद क्या हुआ और कैसे हुआ उन्हें नहीं पता था| शेरू ने बताया सुबह रास्ते में पेड़ भी नहीं पड़ा हुआ था| 

इस आश्चर्यजनक घटना से सभी अचम्भित थे | अन्य साथियों के साथ शेरू दिन में पुनः वहां पर आया| सभी ने देखा की रास्ते में पेड़ गिरने के निशान भी थे परन्तु कोई पेड़ उखडा हुआ नहीं था|उसक गाडी के पलटने और शेर के पंजों के निशान भी थे| दो आदमियों के गाडी के नीचे दबने और खून के धब्बे भी मिटटी में पड़े मिले| सभी ने पास के मंदिर को भी देखा| वहां उसके अन्दर पूजा पाठ के भी कोई लक्षण नहीं दिखाई दिए| जैसा शेरू ने बताया कोई औरत भी नहीं दिखाई दी| बाकी सभी घटनाओं के निशान स्पष्ट दिखाई डे रहे थे | रात को शेरू जहां छिप कर बैठा था वह जगह और वहां शेरू के बैठने के चिन्ह भी दिख रहे थे | यह घटना पूरी यूनिट में चर्चा का विषय बनी हुई थी| 

अंत में सेना के उस यूनिट ने उस मंदिर का पुनःउद्धार किया और इस मंदिर में सेना के पंडितजी रोज पूजा पाठ करते है| हर रविवार को सभी सैनिकों को अनिवार्य रूप से मंदिर में आना होता है|यहाँ पूजा पाठ के बाद प्रसाद का वितरण होता है और सैनिक नाचते गाते वापिस अपनी यूनिट में जाते है| अब इस मंदिर की साफ़ सफाई और देख रेख सेना के हाथ में है| पूर्णमांसी के दिन यहाँ रात्री में भजन कीर्तन होता है| और सभी को वह देवी मंदिर की छत पर घूमती दिखाई देती है| ऐसा माना जाता है की आने वाली धटनाओं का आभास भी पहले ही ओ जाता है| और इसके लिए सेना पहले से ही सतर्क हो जाती है| उग्रवादियों के संभावित् हमले की सूचना पहले ही मिल जाती है | इससे सैनिक पहले से ही सतर्क हो जाते है|यहाँ लगभग ११ हमले हो चुके परन्तु किसी भी जवान को कोई चोट नहीं आई| हर रविवार को मंदिर आना एक आवश्यक किर्याकलाप है| इस को मंदिर परेड के नाम से जाना जाता है|सभी सैनिक इस में केवल आदेश ही नहीं श्रद्धा से शामिल होते है|सेना में मंदिर परेड के नाम से अनवी को आचर्य भी हुआ और श्रद्धा नत मस्तिक भी हुई| घर वापिस आकर उसने इस मंदिर परेड का जिक्र अपने दादा जी से किया तो उन्होंने बताया की हर यूनिट में मंदिर , मस्जिद, गुरुद्वारा या चर्च अवश्य होता है| और रविवार को मंदिर परेड होती है| केवल रविवार को ही नहीं सैनिक अपनी श्रद्धा अनुसार सुबह और सांयकाल की आरती में भी जाते है|दादाजी ने बताया की ऐसा की एक मंदिर जैसलमेर में है| 



राजस्थान के जैसलमेर में भारत-पाकिस्तान की सरहद पर मौजूद देवी मां का वो मंदिर जिससे पाकिस्तानी फौज भी डरती है। तनोट माता के तेज के आगे पाकिस्तानी फ़ौज के गोले भी बेकार हो जाते हैं। 1965 की जंग में पाकिस्तान ने इस मंदिर को निशाना बनाकर हजारों गोले दागे। लेकिन सब बेअसर साबित हुए। बीएसएफ़ के जवान ड्यूटी पर जाने से पहले तनोट माता का आशीर्वाद लेना नहीं भूलते हैं।जैसलमेर की सीमा जो भारत और पाकिस्तान को बांटती है, इसकी सुरक्षा का जिम्मा बीएसएफ़ के जवानों पर है। लेकिन ये जांबाज़ मीलों फैले रेगिस्तान में अकेले नहीं हैं। इन जवानों की रक्षा करती है बॉर्डर वाली माता। बीएसएफ़ के जवान इन्हें बम वाली माता भी कहते हैं। ये है भारत-पाकिस्तान सीमा पर मौजूद तनोट माता का मंदिर। तनोट माता मंदिर के चमत्कार के आगे पाकिस्तान भी नत-मस्तक हो चुका है। 


1965 के युद्ध में पाकिस्तान ने जैसलमेर के तनोट पर कब्जे के लिए तीन तरफ से हमला बोला था। आसमान से पाकिस्तानी फाइटर प्लेन भी बम गिरा रहे थे तो जमीन पर तोप से गोले दागे जा रहे थे। कहते हैं कि यहां करीब 3000 गोले दागे गए थे। इनमें से करीब 450 गोले तो मंदिर के आंगन में गिरे थे। लेकिन कोई भी गोला फटा ही नहीं और मंदिर को एक खरोंच तक नहीं आई। तभी से ये मंदिर बम वाली माता के मंदिर के नाम से मशहूर हो गया। तनोट माता मंदिर का सारा कामकाज बीएसएफ के जवान ही देखते हैं। पुजारी की जिम्मेदारी भी जवान ही निभाते हैं। जवानों का विश्वास है कि तनोट माता मंदिर की वजह से जैसलमेर की सरहद के रास्ते हिंदुस्तान पर कभी भी कोई आफत नहीं आ सकती है। मंदिर में 1965 और 1971 के जंग की गौरवगाथा सुनाती तस्वीरों की पूरी झांकी भी सजी हुई है। मंदिर के भीतर बम के वो गोले भी रखे हुए हैं जो यहां आ कर गिरे थे। जवानों का मानना है कि यहां कोई दैवीय शक्ति है। 


Thursday, 6 September 2018

मानस राष्ट्रीय उद्यान

 

मानस राष्ट्रीय उद्यान

   
अनवी अपनी अगली यात्रा पर मानस राष्ट्रीय उद्यान पहुंची| उसकी सहेली शिबांगी उसके साथ थी| शिबांगी ने इस उद्यान का परिचय कुछ इस प्रकार से दिया|


मानस राष्ट्रीय उद्यान या मानस वन्यजीव अभयारण्य, असम में स्थित एक राष्ट्रीय उद्यान हैं। यह अभयारण्य यूनेस्को द्वारा घोषित एक प्राकृतिक विश्व धरोहर स्थल, बाघ के आरक्षित परियोजना, हाथियों के आरक्षित क्षेत्र एक आरक्षित जीवमंडल हैं। हिमालय की तलहटी में स्थित यह उद्यान भूटान के रॉयल मानस नेशनल पार्क के निकट है। यह पार्क अपने दुर्लभ और लुप्तप्राय स्थानिक वन्यजीव के लिए जाना जाता है जैसे असम छत वाले कछुए, हेपीड खरगोश, गोल्डन लंगुर और पैगी हॉग। मानस जंगली भैंसों की आबादी के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ एक सींग का गैंड और बारह सिंगा के लिए विशेष रूप से पाये जाते है। यह भूटानकी तराई में बोडो क्षेत्रीय परिषद् की देखरेख में ९५० वर्ग किलोमीटर से भी बड़े इलाके में फैला हुआ है, जिसके अंतर्गत १९७३ में टाइगर प्रोजेक्ट  के तहत स्थापित ८४०.०४ वर्ग किलोमीटर का इलाका मानस व्याग्र संरक्षित क्षेत्र भी आता है।


मानस नेशनल पार्क असम का एक प्रसिद्ध पार्क है। इसे यूनेस्को नेचुरल वर्ल्ड हेरिटेज साइट के साथ-साथ प्रोजेक्ट टाइगर रिजर्व, बायोस्फियर रिजर्व और एलिफेंट रिजर्व घोषित किया गया है। यह हिमालय के फुट्हिल पर स्थित है और भूटान तक फैला हुआ है, जहां इसे रॉयल मानस नेशनल पार्क के नाम से जाना जाता है। यह पार्क बालों वाले खरगोश, असम के छतरी वाले कछुए, नाटे कद वाले सुअर और सुनहरे लंगूर सहित कई लुप्तप्राय: जानवरों का घर है। यहां जंगली पानी की भैंस भी बड़ी संख्या में पाई जाती है। इस पार्क में स्तनपाई की 55, पक्षीयों की 380, सरीसृपों की 50 और उभयचर की 3 से ज्यादा प्रजातियां पाई जाती है। आप चाहें तो यहां जंगल सफारी और प्राकृतिक रास्तों पर चलने का भी आनंद उठा सकते हैं। यह नेशनल पार्क कोकराझार, चिरांग, बकसा, उदालगुरी और दारांग सहित कई जिलों में पड़ता है। अक्टूबर से मार्च के बीच में यह पार्क घूमना सबसे अच्छा माना जाता है।इस पार्क का नाम मानस नदी पर रखा गया है, जिसे सर्पों की देवी मनसा के नाम पर रखा गया है। मानस नदी ब्रह्मपुत्र नदी की एक प्रमुख सहायक नदी है, जो इस राष्ट्रीय उद्यान के मुख्य केंद्र से होकर गुजरती है।राष्ट्रीय उद्यान के मुख्य भाग में अग्रगंज एक जंगलो से घिरा हुआ गांव है। इस गांव के अलावा 56 से अधिक गांव पार्क को चारों ओर से घेरे हुए हैं।इस पार्क को तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया है। इसकी पश्चिमी सीमा पनबारी, केंद्रीय सीमा बारपेटा रोड के पास बंसबाड़ी में और पाथस्ला के निकट भूईयापुर में पूर्वी सीमा स्थित हैं। ये श्रेणियां आपस में अच्छी तरह से जुड़ी नहीं हैं।


मानस पूर्वी हिमालय की तलहटी में स्थित है और घने जंगलों से आच्छादित है। मानस नदी पार्क के पश्चिम छोर से बहती है और यह इस अभयारण्य की मुख्य नदी है। यह ब्रह्मपुत्र नदी की सबसे बड़ी सहायक नदी है और बाद में दो अलग-अलग नदियों, बेकी और भौलादुबा में बिभक्त हो जाती है। मानस नदी भारत और भूटान को विभाजित करने वाली एक अंतरराष्ट्रीय सीमा के रूप में भी कार्य करती है।


मानस में दो प्रमुख जैव वातावरण मौजूद हैं:


· चारागाह बायोम: पिग्मी हॉग, भारतीय गैंडे, बंगाल फ्लोरिकन, जंगली एशियाई भैंस आदि।


· वन बायोम: धीमी चलने वाली लॉरी, टोपी वाला लंगूर, जंगली सुअर, सांबर, महान हॉर्नबिल, मलाया की विशाल गिलहरी या काले विशाल गिलहरी आदि।


मानस के मानसून के जंगलों में ब्रह्मपुत्र घाटी के अर्ध-सदाबहार जंगल के जैव क्षेत्र में पड़ते हैं। अभयारण्य के अन्य प्राणियों में भारतीय हाथी, भारतीय गैंडे, गौरा, एशियाई जल भैंस, बारासिंगा, भारतीय बाघ, भारतीय तेंदुओं, एशियाई स्वर्ण बिल्ली, ढोल, टोपी वाले लंगूर, स्वर्ण लंगूर, सांभर हिरण और चीतल इत्यादि हैं।


मानस राष्ट्रीय उद्यान पश्चिमी असम के भाबर क्षेत्र में पूर्वी हिमालय की तलहटी में स्थित है। पार्क का क्षेत्र असम के पांच जिलों चिरांग, कोकराझार, दरांग, उदलगुड़ी और बस्का को कवर करता है। पार्क का क्षेत्र 950 वर्ग किलोमीटर है और समुद्र तल के 110 मीटर से ऊपर से इसकी ऊंचाई 61 मीटर है।


मानस अभयारण्य विभिन्न प्रकार के विशेष पक्षियों के लिए रहने का एक आदर्श स्थान है। मानस में दुनिया में लुप्तप्राय बंगाल फ्लोरिसन की सबसे बड़ी आबादी रहती है औऱ यहां पर ग्रेट हॉर्नबिल भी देखे जा सकते हैं।इस राष्ट्रीय उद्यान में पक्षियों की 380 प्रजातियां रहती हैं। जिनमें प्रमुख रूप से ग्रेटर एडजुटेंट, काले पूंछ वाले क्रेक, लाल सिर वाला टोर्गो, जंगली तीतर, हॉर्नबिल, मार्श और जेर्डोन का बैबलर, रूफस (बादामी) पूंछ वाली चिड़िया, हॉजसन की बुश चैट, रूफस वेंटेक लॉफिंगथ्रश, फिन वेवर, आईबिस बिल और तलहटी प्रजातियां शामिल हैं।




आप चाहें तो यहां जंगल सफारी और प्राकृतिक रास्तों पर चलने का भी आनंद उठा सकते हैं। यह नेशनल पार्क कोकराझार, चिरांग, बकसा, उदालगुरी और दारांग सहित कई जिलों में पड़ता है। अक्टूबर से मार्च के बीच में यह पार्क घूमना सबसे अच्छा माना जाता है। उद्यान में प्रवेश के लिए बांसबाड़ी रेंज आफिस से आपकों १०० रूपए प्रति व्यक्ति की टिकट लेनी पड़ेगी। साथ ही वाहन के लिए अलग से फीस है। यहां जीप सफारी की भी व्यवस्था है। इसके साथ ही ध्यान देने योग्य बात यह है कि यहां सूर्योदय तक ही घूमने की अनुमति है और पैदल घूमनी सख्त मना है। यहां रहकर भी आप वाइल्ड लाइफ का मजा ले सकते हैं। आप यहां से प्राकृति का भरपूर आंनद ले सकते हैं।
सबसे नजदीक का हवाई अड्डा गुवाहाटी एयरपोर्ट से मानस राष्ट्रीय उधान १४५ किमी है जबकि करीब का स्टेशन बरपेटा रोड है। यहां से उद्यान की दूरी २० किमी है| यहाँ पर आप जीप सफारी , हाथी सफारी का आनंद ले सकते है|रिवर राफ्टिंग का ३५ की.मी. का रोमांचकारी लुत्फ़ उठाया जा सकता है|घाटी गाँव और रघु बील गाँवों के छाया के बागन में काम करने वाली जा जातियों के मध्य उनके संगीत और नृत्य का आनन्द ले सकते हो| अपनी दूरबीन द्वारा पक्षियों की विभिन्न प्रजातियों का विन्हावलोकन कर सकते हो|इस उद्यान का नाम साँपों की देवी मानस से लिया है , ब्रह्मपुत्र की सहायक नदी मानस इस उद्यान को दो भागों में विभिक्त करती है|

अनवी शिबांगी के साथ अपनी एक पुरानी सहेली के साथ रघु बील गाँव में ठहरी| यह गाँव एक आदिवासी गाँव है जो यहाँ पर चाय के बागों में काम करते है|हमने आदिवासियों के साथ चायबागान घूम कर देखे और रात्री को उनके साथ वहां के परम्परागत लोक नृत्य और संगीत का आनंद उठाया|इस कार्यक्रम के दोरान एक आदमी को चक्कर आगये और वह नाचते नाचते ही जमीन पर ही गिर गया,और बुद्बबुदाने लगा| लोंगों ने बताया की उसमें मानसा देवी का असर है| ऐसा अक्सर महीने में एक बार हो ही जाता है|
गहन पूछताछ के बाद वहां की एक औरत ने बताया की यह आदमी पहले असम पुलिस में काम करता था| देबांग नाम का एक पुलिस अधिकारी यहीं पर कार्यरत था |एक मेले में वह अपने दल के साथ सुरक्षा व्यवस्था देख रहा था| उसकी पत्नी भी मेले में आई हुई थी| अचानक वर्षा आने के कारण मेले में भगदड़ मच गई और उस भगदड़ में उसकी पत्नी मर गई|उसके परिवार में उआकी एक लड़की शोभा और उसकी बूढी माँ थी| मा के बार बार कहने के बाद भी देबांग ने शादी नहीं की| एक दिन वह माँ कामख्या के मंदिर में पहुँचा और माकी पूजा आराधना की | इसके बाद वह उमानंद मंदिर में गया| अन्य लोगों के साथ वह नदी पार कर रहा था| अचानक उनकी नाव पलट गई| और सारे यात्री बह गए| अथक प्रयास के बाद वह एक छोटे लड़के को बचाने में कामयाब रहा| मा का आशीर्वाद समझ वह बच्चे को घर ले आया| भगवान् शिव की कृपा समझ उसका नाम शिवा ही रखा गया|
माँ देबांग की दूसरी शादी करवाना चाहती थी| परन्तु शिवा के आने के बाद उसकी आशा और धूमिल पड़ गई| वह शिवा से नफ़रत करने लगी| उससे घर का सारा काम करवाने लगी| शोभा अपनी दादी को बहुत प्यारी लगाती थी| गाँव के लड़के शिवा के साथ नहीं खेलते थे| वे उसे पनोती समझ कर चिढाते थे| इस पर उसका अक्सर दूसरे लड़कों से झगडा होने लगता| झगडा मारपीट में भी बदल जाता था|दादी के सौतेले व्यवहार के कारण लड़का भी असंतुस्ट रहने लगा|
रोज रोज के कलेश के कारण वह एकांत में बैठ कर अपनी किस्मत पर रोने लगता|एक दिन उनके घर पर घोड़ी ने एक बच्चे को जन्म दिया| अब शिवा ने बाहर खेलना बंद कर दिया और सारा समय उस घोड़ी के बच्चे के साथ बिताने लगा| बड़ा होने पर शिवा को पुलिस अकादमी में भरी करवा दिया|पढाई पूरी करने के बाद वह असम पुलिस में भरती हो गया| समय ने करवट बदली और दादी का देहांत हो गया| अब आदमी ने अपनी दूसरी शादी करली जो उम्र में उससे काफी छोटी थी| वह एक तांत्रिक थी| उसने अपनी तंत्र विद्या से अपने पति को पूरी तरह काबू में कर लिया था|अब शोभा एक एक दिन गिन गिन कर व्यतीत करने लगी|उसके पिताजी अब उसको प्यार नहीं करते थे|उसकी सौतेली माँ के पास उसके पुराने दोस्त आने लगे | उनमें से एक की नजर शोभा पर थी | शोभा खतरे को भाप चुकी थी|
प्रशिक्षण ख़तम होने पर शिव को बेस्ट कैडिट का इनाम मिला और गोवर्धन पोलिस स्टेशन पर ही उसकी तैनाती हो गई| जब वह घर आया और शोभा को घर का सारा काम करते देखा तो वह काफी परेसान हो गया था| गोवर्धन में ही उसने मकान ले लिया और शोभा के साथ वहीँ रहने लगा| उनकी सोतेली माँ शोभा की शादी कहीं और करना चाहती थी| उसने शोभा का अपहरण करवा लिया और तंत्र विद्या से शिवा को भी पागल बना दिया| शिवा की नौकरी भी छुट गई थी|और अब वह हमारे साथ ही रहता है| अपना विगत याद कर अक्सर ऐसे दौरें आते ही रहते है|
पुछताछ करने पर पता चला की शोभा को भी उसकी सौतेली माँ ने पागल बना कर घर में बंद कर रखा है| शोभा के पिताजी सेवा निवृत हो चुके थे अब वह भी पान ताम्बुल खा और ताड़ी पी कर पडा रहता है | अनवी को इस दुखद कहानी से काफी अफसोश हुआ| उसने शिबांगी से पूछा क्या इनका कभी उद्धार नहीं होगा|दोनों सलाह मसवरा करके शोभा के पिताजी के पास पहुंचे|शिबांगी ने उसको अभिमंत्रित जल पिलाया इससे उसकी पत्नी के जादू का असर होना बंद हो गया| अब वह सारी परिस्थितियां समझ चुका था| शिबांगी की मदद से उसने अपनी लड़की और शिवा पर भी जादू का असर खत्म करवाया| इस नेक काम से अनवी और शिबंगी दोनों खुश थे| मानस राष्ट्रीय उद्यान की इस यात्रा से अनवी काफी खुश थी|नए अनुभव के साथ वह अपने विद्यालय में लौटी |

Wednesday, 5 September 2018

ओरांग राष्ट्रीय उद्यान

        ओरांग राष्ट्रीय उद्यान


अनवी अपनी रहस्यमयी यात्राओं के लिए विद्यालय में काफी चर्चा में थी|उसकी यात्राओ के अनुभव ज्ञान वर्धक और रोमांचकारी थे| एक बार सुनना आरम्भ करो तो बीच में छोड़ने को मन नहीं करता|विद्यालय के साथी बार बार इसे सुनना पसंद करते थे| अनवी स्वयं भी ऐसी यात्राओ पर जाने का कोई अवसर नही छोड़ना नहीं चाहती थी|इस बार उसने लाल चिड़िया को अपने घर पर ही बुला लिया|इस बार लाल चिड़िया ने अनवी को मधुमक्खी बनाया और अपने पंखों में छिपा कर यात्रा में चल पड़ी|इसबार अनवी असम के ओरांग राष्ट्रीय उद्यान में पहुंची|
    ओरांग राष्ट्रीय उद्यान  भारत  के असम  राज्य के दारांग  और शोणितपुर  ज़िलों में स्थित है जो ब्रह्मपुत्र नदी के उत्तर में पड़ता है| १३ अप्रैल १९९९ में इसे राष्ट्रीय उद्यान बना दिया गया।उद्यान के कुल 78.8 वर्ग किलोमीटर में फैला है| इसको राजीव  गांधी ओरांग राष्ट्रीय उद्यान  के नाम से भी जाना जाता है| इसमें काफी मात्रा में घास के मैदान, दल दल जमीन और नदी नाले है|ओरंग गुवाहाटी से १४० की.मी. और तेजपुर से ३२ की.मी. और मंगलदाई से ६८ की.मी. दूर है| यहाँ का नजदीक का रेलवे स्टेशन रोंगापारा पड़ता है|हवाई अड्डा सलोनी, तेजपुर पड़ता है|इसको छोटा काजीरंगा भी कहते है|यह उद्यान अपने प्राक्रितिक दृश्यों के लिए और वन्यप्राणी व वनस्पति के लिए प्रसिध है|कभी उद्यान की जगह जन जाती के काबिले रहा करते थे|इस में २६ मानव निर्मित झीले है|जो प्रवासी पक्षियों का प्रिय स्थल है| एक सिंग के गैंडे,शेर,मल्जुरिया हाथी, हाग हिरण,जंगली सूअर ,विवेट बिल्ली, पोर्चुपैन , पहाड़ी पाइथन(सर्प), डॉलफिनऔर पक्षियों की २२२ प्रजातीयां पाई जाती है|
    ओरांग राष्ट्रीय उद्यान में निम्नलिखित स्थान भी देखने लायक है:-
१.      मदन कामदेव मंदिर:-यह मंदिर कामरूप जिले में है जो ९वी और १०वी शताब्दी का बना हुआ है|
२.    सौल्कुची गाँव:-रेशम के लिए प्रसिद्ध यह गाँव गुवाहाटी से ३०की.मी. की दुरी पर है| यहाँ रेशम की सुंदर साड़ी बनाई जाती है|१७वी सदी का यह गाँव रेशम बुनकरों के लिए प्रसिध है|

उद्यान में क्या देखें :-

१.     वन्य जीव :घास से भरे मैदानों में सफारी की सवारी किये बिना आपकी यात्रा अधूरी है|यह उद्यान बहुत सी विलुप्त हो रही प्रजातियों का घर है|यहाँ पर गैंडे,हाथी, हिरण,सूअर और साँपों की कई प्रजातियाँ देखने को मिल जाती है|

२.   पक्षी अवलोकन:-यह उद्यान लगभग २०० प्रजातियों के पक्षियों की शरण स्थली है|आमतोर पर यहाँ पर हेरॉन,बंगाल फ्लोरिकन,पेलिकन , किंगफ़िशर,सुनहरी चील के अलावा और बहुत से पक्षी देखे जा सकते है|

३.   हाथी इस्वारी:-ओरांग में हाथी की सवारी अविस्मरिनिये होगी|जो वन विभाग द्वारा आयोजित की जाती है|

४.   क्रूज की सवारी:-उद्यान के एक सिरे से दुसरे सिरे तक ब्रहाम्पुत्र नदी में क्रूज की सवारी का आनंदा लिया जा सकता है|

ओरांग की यात्रा सिंगारी बंगाली गाँव से आरम्भ की जा सकती है|यहीं से आप लाओ-खोवा वन्य जीव अभ्यारण्य भी जा सकते हो|इस गाँव में आने पर आपके समूह बना कर आप की यात्रा की तैयारी की जाती है|यहीं से आप बूरा-चपोरी वन्य जीव अभ्यारण्य जा सकते है|यहाँ स्तनधारी जीवों की कई प्रजातिया,रॉयल बंगाल शेर,एशियाई हाथी,सुनेहरे हिरण की चार प्रजातीया और पिग्मी हॉग ( सूअर की एक विलुप्त प्रजाति) देखने को मिल जाती है |यह उद्यान पाचानोई नदी, बेल सिरी और धन श्री नदीयों से घिरा हुआ है |ये सभी ब्रहमपुत्र की सहायक नदियाँ है|उद्यान के चारों और आबादी वाले क्षेत्र है| यहाँ मच्छलियों की ५० प्रजातियाँ पाई जाती है|

    अनवी ने शिबांगी के साथ ओरांग की यात्रा आरम्भ की|शिबांगी ने बताया की उद्यान की जगह पहले आबादी हुआ करती थी| परन्तु महामारी के प्रकोप के कारण गाँव वालों ने और कही अपना आवास बना लिया| बताया जाता है की बुरी आत्माओं के डर से गाँव वाले सदा के लिए यह स्थान छोड़ कर चले गए| इस सुनसान जंगल में एक अघोरी दम्पति तंत्र साधना में काफी समय से लगा हुआ था| उसने एक छोटी झोपड़ी बना राखी थी| रात्री में अपने बचाव के लिए झोपड़ी में नीचे जमीन में एक गुफा बना राखी थी| इस से जंगली जानवरों से बाख कर गुफा में रात्री को छुपा जा सके|रात्री को गुफा का दरवाजा पेड़ों की टहनी और पत्तों से ढक दिया करते थे|वे अपनी साधना में इतने व्यस्त रहते थे की उन को यह जानकारी नहीं होती थी की पास से कौन गुजर गया|अपने आप को वर्षा से बचाने के लिए झोपड़ी में जंगली जानवरों की खाल लगा रखी थी| पशुओं की हड्डिया भी झोपड़ी पर ही पड़ी हुई थी|अघोरी प्रथा के अनुसार वे पूरण रूप से गंन्दगी और बदबू के बीच रह रहे थे|वे इस वातावरण के अभ्यस्त हो चुके थे|झोपड़ी के अन्दर ही टट्टी और पेशाब की बदबू आती थी|

    एक दिन एक राजा शिकार करने जंगल में आया और रास्ता भटक गया| रात हो चली थी| जंगली जानवरों का पूरा डर था|गहराती रात में जंगली जानवरों की आवाज साफ़ सुने डे रही थी|राजा को रात बिताने का आश्रय कहीं नहीं मिला|अंत में राजा को उस अघोरी की झोपड़ी दिखी दी| वह वहां आया और नाक बंद करते हुए रात बिताने के लिए आश्रय माँगा|अघोरी ने कहा मेरे पास जगह नहीं है| एक बार जो यहाँ ठहर जाता है फिर जाने का नाम नहीं लेता| राजा जे आश्वाशन दिया की सुबह दिन निकलते ही वह चला जाएगा| काफी आग्रह के बाद अघोरी आश्रय देने को तैयार हुआ| परन्तु कहने लगा की नीचे गुफा में केवल दो प्राणी ही आराम कर सकते है|उसमें केवल इतनी ही जगह है| अन्त में यह तय हुआ की गुफा में अघोरी कि पत्नी और राजा आराम करेंगे | और अघोरी झोपड़ी में पहरा देगा | राजा को काफी देर तक बदबू के कारण नींद नहीं आई| परंतू दिन की थकान के कारण राजा को ऐसी नींद आई की सुबह ही आँख खुली| वह गुफा से बाहर आया तो देखा की अघोरी को हिंसक जानवर खा गए थे| अघोरिकी पत्नी विलाप करने लगी| राजा उसको धाडस बंधने लगा किन्तु सब बेकार|अघोरी की पत्नी चुप होने का नाम ही नहीं लेती थी| उधर राजा के सैनिक राजा की तलास में वहां पहुँच गए|मामला पेचीदा हो गया था|

    अन्त में राजा ने सैनिक को कहा की में एक महीने में इसके पति को ज़िन्दा कर दूँगा| तब तक यह राज कार्य संभालेगी | इसके पति के ज़िन्दा होने पर यह वापिस झोपड़ी में आ जायेगी  और में राज कार्य देखने लगुगा|तब तक के लिए यह ही तुम्हारी राजा है  सभी को इस के दिशा निर्देशों का पालन करना होगा | यह सुन सैनिक अघोरी की पत्नी को सम्मान पूर्वक महल में लाए आयें और उसके आदेशों पर राज कार्य चलने लगा | उधर राजा उसी बदबू वाली झोपड़ी में रह कर भगवान आशुतोष की आराधना करने लगे| अघोरी की पत्नी राज कार्य बखूबी से निभा रही थी|एक दिन राज कुमारी बाग़ में टहलने गई| वहां उसने एक घायल हंस को देखा राजकुमारी ने प्यार से हंस को उठाया और देख की उसके पैर में घाव था|राजकुमारी ने उसके पैर पर मरहम पट्टी बाँधी और पुचकार कर बाग़ में ही छोड़ दिया| अब राजकुमारी रोज हंस को दवाई लगाती और उसको खाने को देने लगी| दस दिन की देखभाल और उपचार के बाद हंश ठीक हो गया और राज कुमारी को अलबिदा कह उड़ गया |हंस पड़ोस के राज्य के राज कुमार के पास चला गया |

    राज कुमार को हंस ने राज कुमारी  के सोंद्रिये  और विनम्रता  की प्रशंसा की | हंस एक दूसरे के प्रेम पत्र पहुँचाने लगा | दोनों का प्यार परवान चढ़ रहा था| एक दिन राज कुमार राज कुमारी से मिलने आ पहुंचा| वह कार्यकारी राज माता से मिला और अपने आने का प्रयोजन बताया| कार्यकारी राज माता ने सेवकों के हाथ समाचार पहुँचाया और दरबार में राज कुमारी और रानी शिष्टता के साथ हाजिर हो गई |वे अतिथि गृह में राज कुमार को चाय पानी पिला कर आदर सत्कार करने लगी|विचार विमर्श के बाद रानी ने राज कुमार से एक महीने का समय माँगा ताकि राजा वापिस तपस्या के बाद अपनी राज गद्दी सम्भाल ले|इसके बाद ही कोई निर्णय लिया जाएगा| इस प्यार की चर्चा दूर दूर तक होने लगी| एक दिन राज कुमारी बाग़ में घूम रही थी की अचानक वह ग़ायब हो गई | सैनिकों ने बहुत तलास किया परन्तु राज कुमारी का पता नहीं चला|इस बात का जब कार्यकारी राज माता को पता चला तो उसने अपनी साधना के बल पर राजकुमारी को तलास किया तो उसको पता चला की राज कुमारी को मदन कामदेव मंदिर के पास किसी तांत्रिक ने सम्मोहित करके अपने पास रखा हुआ है| कार्यकारी राज माता ने रानी को अपने पास बुलाया और सारा माजरा समझाया| उसने अपने विश्वास पात्र सैनिकों की एक टुकड़ी के साथ सेनापति को छदम वेष में एक फूल अभिमंत्रित करके दिया और मदन कामदेव मंदिर के पास भेजा जहाँ पर तांत्रिक साधना कर रहा था|सेनापति को बताया की इस फूल से उस तांत्रिक पर पानी के छीटें मारने है| यह सब गुप्त रहना चाहिये| बतायी युक्ति के अनुसार सेनापति ने कार्य को अंजाम दिया और उस सिद्ध किये फूल से पानी के छींटे लगते ही वह तांत्रिक वहीँ पर भस्म हो गया| सैनिक राजकुमारी को सकुशल वापिस ले आये| इस पर रानी बहुत खुश हुई|

   एक महिना  पूरा होने को था राजा को कोई सफलता नहीं मिलती दिखाई डे रही थी| कार्यकारी राज माता ने अपने गुप्तचरों को बुलाया और उनको अघोरी का कंकाल चुपके से उठा कर लाने को कहा|अघोरी बाबा का कंकाल आचुका था | परन्तु राजा इससे बेखबर थे| रानी ने सैनिक भेज कर राजा को महल में बुला लिया और कंकाल पर अभिमंत्रित जल छिड़कते ही अघोरी बाबा उठ खड़े हुए|अब राजा और रानी दोनों अघोरी बाबा के पैरों में गिर गए और क्षमा मांगने लगे | बाबा ने कहा क्षमा मागने वाली तो कोई नहीं है| अघोरी बाबा और उसकी पत्नी अपने वास्तिक रूप में आगये| वे दोनों शिव और पार्वती थे | भगवन शिव और पार्वती के साक्षात दर्शन पा कर पूरा दरबार धन्य हुआ और भोले बाबा का गुण गान करने लगे| इस पर राजा ने भगवान् आशुतोष से एक शंका का समाधान चाहां| राजा पूछने लगे भगवन आपकी झोपड़ी का क्या रहस्य है| यज जीवन उस झोपड़ी की तरह है| मनुष्य माँ के गर्भ में इतनी ही गन्दगी में रहता है और इस संसार में इतने ही कष्ट उठाता है,परन्तु फिर भी इस से मोह हो जाता है|इस देह को छोड़ना नहीं चाहता ही|

    आपने पिछले जन्म में मेरे दर्शन की अभिलाषा की थी उसको मैंने पूरी कर दी है |और हम दोनों ने अपना वास्तविक रूप आप सभी को दिखाया है| मनुष्य अपने कर्मों का फल अवश्य पाता है | कर्मों के अनुसार की दंड या पुरुष्कार मिलता है| इस संसार में मनुष्य आकर वासना, तृष्णा ,मोह और लोभ आदि की गंदगी में फस जाता है| आरम्भ में उसकी आत्मा इन सब को स्वीकार नहीं करती| परन्तु धीरे धीरे वह इस माहौल का आदि हो जाता है| जैसे तुम मेरी झोपड़ी के आदि हुए थे|

इसके बाद राजकुमारी माँ पार्वती  के चरणों में गिर पड़ी| माँ पार्वती कहने लगी तुम्हारी शादी में कुछ व्यवधान आयेंगे| में तुम्हे यह लाल तितली देती हूँ| इसको खुला बाग में विचरण करने दो|यह तितली जिस भी प्राणी पर बैठ जाती है वह प्राणी और तितली दोनों अदृश्य हो जाते है|जब तुम्हे इसकी जरुरत पड़ेगी यह अपने आप तुम्हार पास आ जायेगी| कोई तांत्रिक मंत्र विद्या के बल पर राज कुमार बन कर आएगा, ऐसे कपटी पर जब यह तितली बैठेगी तो वह गायब नहीं होगा| असल का राज कुमार अदृश्य हो जायेगा|इसी विधि से तुम असली और नकली राज कुमार क पहचान कर अपना स्वयंबर पूरा करना|इतन कह कर शिव-पारवती अंतरध्यान हो गए|

   कुछ समय बाद राजा ने राज कुमारी का स्वयंबर रखा| इस स्वयंबर में बहुत से राज कुमार आयें| उसकी पसंद का राजकुमार भी आया , परन्तु वे दो एक ही शक्ल के थे | राज कुमारी ने देखा की एक तितल उडती हुई आई और बारी बारी से दोनो राज कुमारों पर बैठ कर राज कुमारी को असली और नकली का आभास करवा दिया|  राजकुमारी शादी के बाद अपने ससुराल आगे वहीँ से एक तांत्रिक ने उसका अपहरण कर लिया और मायोंग गाँव ले आया| उस सिद्धि के असर से मैं राज कुमारी से शिबांगी बन कर रह गई |यह तितली मेरे और राज कुमार के बीच  में संपर्क सूत्र है | मैं तुम्हारी मदद से वापिस अपने ससुराल जा पाउंगी|राजकुमारी की बताई युक्ति के अनुसार अनवी ने तितली के मदद से एक अघोरी से सम्पर्क बनाया और उसके सुझाये तरीके से अनवी ने शिबांगी को पुनः राज कुमारी को अपने ससुराल भेज दिया

    शादी के बाद अनवी का वहां पर दिल नहीं लगा और अगले ही दिन वह अपने शेष दो दोस्तों से मिलने चली गई|अब वह बन्दर,गैंडे और चिड़िया के पास रह रही थी | तभी उसे अपनी छुट्टियाँ ख़तम होने की याद आई और लाल चिड़िया ने उसे गुरुग्राम ला कर छोड़ दिया|