Saturday, 1 September 2018

यात्रा का शुभारम्भ

                                              मेरी पहली यात्रा 

      यहाँ पर उपरोक्त विवरण केवल इस लिए किया गया है की आप आगे की कहानी को समझ सके और पूरा मनोरंजन कर सके |असम में कई वन्य प्राणी अभ्यारण्य है | जो सभी के लिए ज्ञानवर्धक है |गुरूग्राम के एक विद्यालय के विद्यार्थी अपने साथियों के साथ असम घूमने गए और वहाँ  पर उन्होंने क्या देखा और क्या समस्याएँ आई , इस कथा का असली कथानक है |

    अनवी अपनी कक्षा के साथ असम भ्रमण के लिए आती है | उनका विचार असम के वन्य प्राणी अभ्यारण्य और वन्य राष्ट्रिय उद्यान देखने का था| इनमे प्रमुख निम्नलिखित है :-

राष्ट्रीय उद्यान व वन्यजीव अभ्यारण्य में अंतर :- वन्यजीव अभ्यारन्यो   का गठन किसी एक प्रजाति अथवा कुछ विशिष्ट प्रजातियों के संरक्षण के लिये किया जाता है, अर्थात ये विशिष्ट प्रजाति आधारित संरक्षित क्षेत्र होते हैं ! जबकि राष्ट्रीय पार्क का गठन विशेष प्रकार की शरणस्थली के रूप में संरक्षण के लिये किया जाता है अर्थात इस विशेष शरणस्थली क्षेत्र में रहने वाले सभी जीवों का संरक्षण समान रूप से किया जाता है !
·          राष्ट्रीय पार्क में किसी भी प्रकार के अधिवास और मानवीय गति विधि की अनुमति नही होती है , यहां तक कि जानवरों को चराने या जंगली उत्पादों को इकट्ठा करने की अनुमति भी नही होती है| जबकि वन्यजीव अभयारण्य में मानव गतिविधियों की अनुमति दे दी जाती है !
·          एक वन्यजीव अभ्यारण्य में शिकार अनुमति के बिना निषिद्ध है , हालांकि पशु चराने और मवेशियों की आवाजाही की अनुमति है ! जबकि एक राष्ट्रीय उद्यान में शिकार और चराना पूरी तरह से निषिद्ध हैं !
·          एक वन्यजीव अभ्यारण्य को राष्ट्रीय पार्क में परिवर्तित किया जा सकता है जबकि एक राष्ट्रीय पार्क को अभ्यारण्य घोषित नही किया जा सकता !
·          वन्यजीव अभ्यारण्य और राष्ट्रीय पार्क दोनों की घोषणा राज्य सरकार केवल आदेश देकर कर सकती है जबकि सीमा में परिवर्तन के लिये राज्य विधान मंडल को एक संकल्प पारित करना होता है !

. मानस नेशनल पार्क:-असम के गुवाहाटी में स्‍थित मानस नेशनल पार्क विश्‍व धरोहरों में शामिल है। हिमालय की तलहटी में स्‍थित इस अभ्यारण्य में दुर्लभ वन्‍य जीव पाए जाते हैं। जिसमें कि हेपीड खरगोश, गोल्‍डन लंगूर और पैगी हॉग शामिल हैं। इन्‍हें देखने लोग दूर-दूर से आते हैं। 
2. ओरंग नेशनल पार्क:-असम के शोणितपुर जिले में स्‍थित ओरंग नेशनल पार्क गैंडे के लिए जाना जाता है। यहां आपको काफी संख्‍या में गैंडे मिलेंगे। साल 1985 में इसको अभ्यारण्य घोषित किया गया। इसके बाद यहां पर पर्यटकों का तांता सा लगने लगा।
 ३. नमेरी नेशनल पार्क:-असम के तेजपुर से करीब 35 किमी दूर स्‍थित है नमेरी नेशनल पार्क। यहां आपको हाथी देखने को मिल जाएंगे आप इनकी सवारी भी कर सकते हैं। इसके अलावा पक्षियों से लगाव रखते हैं तो करीब 300 चिड़ियों की प्रजातियां यहां पाई जाती हैं।
. काजीरंगा नेशनल पार्क:-यह असम का सबसे बड़ा और मशहूर राष्‍ट्रीय उद्यान है। यह अभ्यारण्य एक सींग वाले गैंडा के लिए जाना जाता है। इसके अलावा पक्षियों व अन्‍य जीव-जंतुओं की तमाम प्रजातियां यहां देखने को मिल जाती हैं।
.  डिब्रू सैखोवा नेशनल पार्क:-असम के डिब्रूगढ़ में स्‍थित सैखोवा नेशनल पार्क मुख्‍य रूप से सफेद पंखों वाले देवहंस के संरक्षण के लिए बनाया गया था। बाद में यह राष्‍ट्रीय उद्यान जंगली घोड़ों और चमकदार सफेद पंखों वाली बत्तख के रूप में प्रसिद्ध हो गया। यहां पक्षियों की करीब 350 से ज्‍यादा प्रजातियां पाई जाती हैं।
पोबीटोरा वन्य जीव अभ्यारण्य :- यह गुव्हाटी से ५० किलोमीटर दूर मारी गाँव जिले में है |इसके किनारे पर मायोंग गाँव स्थित है | यह अभ्यारण्य मुख्य रूप से एक सींग वाले गेंडे के लिए जाना जाता है। 30.8 वर्ग किमी में फैले इस अभ्यारण्य में 16 वर्ग किमी में सिर्फ गेंडे रहते हैं। चूंकि यहां बड़ी संख्या में गेंडें हैं, इसलिए ऐसा कहा जाता है कि गेंडे अभ्यारण्य से बाहर भी निकल आते हैं। गेंडें के अलावा इस वन्य जीव अभ्यारण्य की दूसरी विशेषता यहां हर साल आने वाले प्रवासी पक्षी हैं। यहां हर साल करीब 2000 प्रवासी पक्षियां आते हैं। अभ्यारण्य में एशियाई भैंस, तेंदुआ, जंगली बिल्ली और जंगली भालू सहित कई अन्य जीव भी देखे जा सकते हैं ७.  चक्रशिला वन्यजीव अभयारण्य:- चक्रशिला वन्यजीव अभयारण्य भारत का दूसरा गोल्डन लंगूर के निवास स्थान के लिए प्रसिद्ध है। यह पहले एक आरक्षित वन था, लेकिन वर्ष 1 99 4 में इसे वन्यजीव अभयारण्य घोषित किया गया था। इस पार्क में पर्यटक 14 विभिन्न प्रजातियों की सब्जियों, 60 प्रकार की मछली और उभयचर की 11 प्रजातियों के अलावा पक्षियों की 273 प्रजातियों को देख सकते हैं। वन्यजीव अभयारण्य में दो झीलें हैं, जो इस पार्क की सुन्दरता को बढ़ाती हैं, इन झीलों को धीर बील और डिप्लाई बील कहा जाता है, और ये अभयारण्य पर दोनों तरफ स्थित हैं।
८. होलोगापार गिब्बन वन्यजीव अभयारण्य :- भारत में एकमात्र वन्यजीव अभयारण्य है जो पहाड़ी गिब्बन का घर है। यह छोटा वन्यजीव अभयारण्य बंगाल धीमी लॉरी, हाथी, बाघ, तेंदुए, पैंगोलिन, सुअर-पूंछ वाले मैकक, असमिया मैकक, स्टंप पूंछ मैकक, रीसस मैकक और कैप्ड लैंगर्स का घर है। इसके अलावा यहां भारतीय पाइड हॉर्न बिल, ओस्प्रे, हिल मन्ना और कालीज फिजेंट जैसे अभयारण्य में कई प्रकार के प्रवासी और निवासी पक्षियों को देखा जा सकता है।
    पूरी कक्षा के साथ अनवी असम घुमाने चल पड़ती है |एक सिंग वाले गेंडे को देखने उन का पहला पड़ाव पोबीटोरा वन्य जीव अभ्यारण्य चुना गया| अध्यापक को आचानक ही मायोंग का ख्याल आया, परन्तु उसने बच्चो को मायोंग के बारे में कुच्छ नहीं बताया| पूरा समूह पोबीटोरा वन्य जीव अभ्यारण्य की और बढ़ रहा था| अचानक अनवी को रास्ते में एक गुड़ियाँ मिली| जिसको अनवी ने छुपाके अपने पास रख लिया| अनवी एक बहदुर लड़की थी| उसे डर नहीं लगता था |वह अपने साथियों के साथ अभ्यारण्य में घूम रही थी | सभी बच्चे बड़े चाव से अभ्यारण्य देख रहे थे | बच्चे हाथी की सवारी का आनंद ले रहे थे |यहाँ तरह तरह के पक्षी थे | अनवी रंग बिरंगे पक्षियों को देख कर काफी खुश थी |अचानक एक छोटी लाल चिड़िया उड़ कर अनवी के कंधे पर आ बैठी| अनवी  चिड़िया को देख काफी खुश हुई | वह प्यार से उसे सहलाने लगी |वह उससे बातें करने लगी | यह जान कर अनवी को आश्चर्य हुआ की चिड़िया उस की बोली समझ रही थी और हिंदी बोल भी रही थी |अपनी जेब से बिस्कुट निकल कर अनवी ने चिड़िया को खिलाया |अनवी प्यार से उसे पूछ रही थी भूख लगी है प्यास लगी है | इस पर चिरिया ने कहा नहीं मुझे भूख प्यास नहीं लगी परन्तु मै तुम्हे अपना दोस्त बनाना चाहती हूँ | अनवी ने ख़ुशी ख़ुशी उस की दोस्ती स्वीकार कर ली और उसे प्यार करने लगी | नए दोस्त पाने के चक्कर में अनवी अपनी कक्षा से बिछुड़ गयी और उसके साथ बैटन में लगी रही |जब उसो अपने साथी कहि नहीं मिले तो वह उदास हो गयी |कोई बात नहीं मैं तुम्हे अपने घर ले जाउंगी| अब अनवी चिड़िया के घर चली गई | चिड़िया एक पेड़ की शाखा पर बैठ गई और पेड़ से एक मीठा फल उसको खाने को दिया| अनवी ने वह फल खाय और खाते ही वह चिड़िया जितनी छोटी हो गयी |अब वह लाल चिड़िया के साथ पेड़ की टहनी पर बैठ सकती थी | अचानक अनवी का पेड़ की शाखा से संतुलन बिगड़ गया और नीचे बह रही नदी में गिर गई |वह नदी के पानी में नीचे और नीचे जाती जा रही थी| उसको पानी में साँस लेने में कोई परेशानी नहीं हो रही थी | नदी के तल में उसे सुंदर सुंदर रंग बिरंगी मच्छालियाँ मिली |इन्हें पा कर अनवी काफी खुश थी| अचानक एल लाल मच्छली उसके हाथ पर आ बैठी | अनवी ने प्यार से उस मच्छली पर हाथ फेरा और वह अपनी वास्तविक आकार में आ गई | अब वह नदी जल से बाहर आ गई थी | वहां उसको लाल चिड़िया भी नहीं डिकी दी | ना ही लाल मच्छली उसके साथ थी | अब वह अकेली नदी किनारे बैठी थी |वह अपनी कक्षा से भी बिछुड़ चुकी थी |उसको रह रह कर अपने पापा की याद आ रही थी |घर पर उसके पास एक प्यारा सा पिल्ला था| आब अनवी को उस पिल्ले की चिंता सताने लगी | उसका नाम मिन्नी रखा हुआ था | उसको अपनी चिंता की बजाय मिन्नी की चिंता सता रही थी | पता नहीं मिन्नी ने खाना खाया या नहीं| वह पहली बार मिन्नी से लम्बे समय के लिए अलग हुई थी | अनवी विचारों में खोई हुई थी अचानक उस को लाल चिड़िया की आवाज सुनाई  दी |वह उसको इधर उधर खोजने लगी |लाल चिड़िया एक पेड़ से दुसरे पेड़ पर फुदक रही थी| अनवी उसका पीछा करती करती दूर पहुँच गयी | वहां उसको एक दरवाजा दिखाई दिया | अनवी उस दरवाजे में प्रवेश कर गई| दरवाजे से वह एक बड़े कमरे में पहुँच गई |वहां उसे चार दरवाजे दिखाई दिए | परन्तु सभी पर ताले लगे हुए थे| पास में पड़ी एक मेज पर एक चाबी रखी हुई थी| उस ने चाबी उठाई और बरी बरी से ताले खोलने का प्रयास करने लगी| अंत में एक दरवाजा खुल गया| और वह उस कमरे में प्रवेश कर गई| उस कमरे में एक रसोई थी| उसने रसोई में रखे सामान की तलासी ली | अंत में उसे एक बर्तन में दूध मिला|दूध का स्वाद कुछ अलग लग रहा था| परन्तु भूख में जो मिले वाही उपयुक्त होता है| जैसे ही अनवी ने दूध पिया उसे नींद आने लगी| और वह वहीँ पर लुढ़क गई | जब उसकी आँख खुली तो उसने अपने आप को एक सुंदर बैग में पाया|उसके कपडे भी बदले जा चुके थे |किसी ने उसे स्नान करवा कर कपडे बदल दिए थे|अचानक रास्ते में मिली गुडिया का ख्याल आया  और उसने पाया की गुडिया नए कपड़ो में भी थी|उसने गुडिया को धयान से देखा उसके कपडे भी बदले जा चुके थे| वह उसके बालों में हाथ घुमाने लगी| हाथ घुमाने से उसके पास लाल चिड़िया, एक छोटा सुनहरे रंग का बन्दर जो केवल छ इंच का था| अनवी ने उसको अपनी हथेली पर बैठाया और प्यार करने लगी| तभी वहां पर एक छोटा एक सिंग वाला गैंडा आ गया| वह मुसकिल से आकर में एक फूट का होगा| अनवी उसको आराम से उठा सकती थी| अनवी ने पहले कभी गैंडा नहीं देखा था| हाँ गैंडे के चित्र अवश्य देखे थे| उसके छोटे आकर को देख वह चकित नहि हुई | उसको गैंडे के असली आकर का पता ही नहीं था| अब बन्दर और चिड़िया उसके कंधो पर बैठे थे| वे दोनों उसके बालों से खेल रहे थे| नए ख़ूबसूरत साथी पा कर अनवी अपनी चिंताए भूल चुकी थी | उसके पास ही एक नदी बह रही थी| उसमें उसे एक नौका आती दिखाई दी | वहां यात्री एसी नौकाओं की यात्रा का आनद लेते है| नौका उसके नजदीक से गुजर रही थी| नौका में बैठे यात्रियों में काफी कोतुहल था| यात्री कह रहे थे एक प्यारी सी बच्ची बाघ में अकेली बैठी थी| उस के पास वह लाल चिड़िया, सुनहरे छोटे लंगूर के साथ खेल रही थी| उसके पास एक छोटा सा गैंडा भी था| नाविक ने उन सभी को चुप रहे की सलाह दी और जल्दी से नौका आगे बाधा ली|उस इलाके से बाहर आने पर नाविक ने सुख की साँस ली | उसने यात्रियों को बताया की बहुत अच्छा हुआ हम सकुशल बहार आ गए| आप लोंगों ने बाग़ में क्या देखा? क्या इतना छोटा गैंडा कभी होता है? सभी यात्रियों ने कहा नहीं| गैंडा औसतन एक हाथी जितना आकार में होता है| फिर वह कोई मूर्ति भी नहीं थी| नाविक ने बताया यह इलाका मयोंग गाँव के नजदीक पड़ता है| यहाँ हर घर में जादू टोना होता है|यहं की औरते इन्सान को पशु-पक्षी, मधुमक्खी, चिड़िया या बोना बना कर घर में पालतू पशु की तरह रख लेती है और घर का कम करवाती है| जंगली हिंसक जानवरों को सम्मोहित कर के पालतू बना लेती है|आप सभी ने देखा होगा एक सुंदर सी लड़की के पास केवल छ इंच का लंगुर और एक फुट का एल सिंग वाला गैंडा था| क्या आप में से किसी ने एक फुट का गैंडा इस से पहले देखा या सुना है| नाविक की बात सुन कर कुछ यात्री डर गए|और शेष यात्रयों में इस बारे में और जानने की उत्सुकता दिखाई|यात्रियों को नदी के किनारे उतार कर नाविक ने विदा ली|
    उधर अनवी बाग़ में नदी किनारे लाल चिड़िया,छोटे लंगूरऔर गैंडे के साथ खेल रही थी|वह नए साथियों के साथ खेल में व्यस्त थी| उसे घर और पाठशाला की याद बिलकुल नहीं आई|वह इन सभी नए साथियों की बोली समझती थी|थोड़ी देर में अनवी को प्यास लगी | उसने लंगूर से पानी माँगा| लंगूर झटसे एक नारियल के पेड़ से नारियल तोड़ लाया और उसका पानी पीने के लिए नवी को डे दिया| नारियल का ताजा पानी स्वादिष्ठ था| अनवी ने उनको कहा आओ अब हम खेलते है| मैं तुम्हारी अध्यापिका हूँ| में तुम्हें पढ़ती हूँ| बन्दर बहुत से केले के पत्ते तोड़ कर ले आया और पत्तों पर तिनके से लिख लिख कर एक घंटा पाठशाला चली| सभी को भूख लग आई थी|अब कुछ खाने को मिलाना चाहिए| बन्दर ने गैंडे को लाल फूल खाने को दिए | जिनको खा कर गैंडा अपने वास्तविक रूप में आ गया| तीनो को अपनी पीठ पर बैठा कर सघन वन की और चल पड़ा| आधे घंटे की यात्रा के बाद वह एक आलीशान महल के सामने खड़ा था|महल की भव्यता देखते ही बनती थी| उसके सामने गैंडे की सवारी कोई शाही सवारी जैसी लग रही थी| द्वार पर पहुचते ही हमारा भव्य स्वागत किया गया| हमें वहां शाही मेहमान की तरह रखा गया|पूरा महल रोशनी से जगमगा रहा था| नाच गाने का कार्यक्रम चल रहा था|युगल अपनी सर्वश्रेठ कला का प्रदर्शन का कर रहे थे| पूछताछ करने पर पता चला की यह सब बिहू की तैयारी चल रही थी|२०-२५ युवक युवतीयों का समूह अपनी कला का प्रदर्शन करता है | और इस दौरान अपनी पसंद का जीवन साथी का चुनाव कर शादी संपन्न करते है|यही कारण है की असम में ज्यादातर शादीयां बैशाख मास में ही संपन्न हो जाती है|
    बिहु असम के तीन अलग अलग सांस्कृतिक उत्सवों के एक समूह को दर्शाता है और दुनिया भर के असमी प्रवासी इसे धूमधाम से मनाते हैं। यद्यपि वे प्राचीन संस्कार और प्रथाओं को उनका  मूल मानते है |हालांकि उन लोगो ने निश्चित शहरी सुविधाओं को अपना लिया है |और हाल की दशकों में शहरी और लोकप्रिय त्योहार बन गए हैं। उनमें से एक अप्रैल में मनाये जाने वाले असमिया नव वर्ष भी शामिल है। बिहु शब्द बिहु नृत्य और बिहू लोक गीत दोनो की और संकेत करते है। रोंगाली बिहु या बोहाग बिहु असम का एक महत्वपूर्ण त्योहार है। बिहु असम के सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार है, जो सभी असमियों द्वारा बहुतायत में मस्ती के साथ मनाया जाता है बिना उनके जाति, धर्म और विश्वास में भेद किये।
    बिहु शब्द दिमासा लोगों की भाषा से ली गई है| जो की प्राचीन काल से एक कृषि समुदाय है। उनका सर्वोच्च देवता ब्राई शिबराई या पिता शिबराई हैं। मौसम की पहली फसल अपनी शांति और समृद्धि की कामना करते हुए ब्राई शिबराई के नाम पर अर्पित किया जाता हैं। तो 'बि' मतलब 'पुछना' और 'शु' मतलब पृथ्वी में 'शांति और समृद्धि' हैं। अत: शाब्दिक रूप से बिशु धीरे-धीरे भाषाई तहजीह को समायोजित करने के लिये बिहु बन गया। अन्य सुझाव यह हैं कि 'बि' मतलब 'पुछ्ना' और 'हु' मतलब 'देना' और वही से बिहु नाम उत्पन्न हुआ। यह " कलागुरु " विष्णु प्रसाद राभा द्वारा कहा गया था । असम में रोंगाली बिहू बहुत सारे परंपराओं से ली जाती हैं जैसे की- बर्मी-चीन, ऑस्ट्रो - एशियाटिक, हिंद-आर्यन| बिहू बड़े ही उत्साह के साथ मनाया जाता हैं। त्योहार अप्रैल के मध्य में शुरू होता हैं और आम तौर पर एक महीने के लिए जारी रह्ता हैं। यह पारंपरिक नव वर्ष है। इसके अलावा दो और बिहु हैं: अक्टूबर में कोंगाली बिहु (सितम्बर विषुव के साथ जुड़े) और जनवरी में भोगाली बिहु (जनवरी संक्रांति से जुड़े)। अधिकांश अन्य भारतीय त्योहारों की तरह, बिहू (तीनों ही) खेती के साथ जुड़ा हुआ हैं, जैसे की पारंपरिक असमिया समाज मुख्य रूप से कृषि पर ही निर्भरीत हैं। वास्तव में, वैसा ही बहुत सारे उत्सब लगभग उसी वक्त पे पुरे भारतबर्श में मनाया जाता हैं।असम में एक साल में तीन बिहु मनाया जाता हैं बोहाग (बैसाख, अप्रैल के मध्य), माघ (जनवरी के मध्य में) और काटी (कार्तिक, अक्टूबर के मध्य) के महीनों में। बिहु प्राचीन काल से असम में मनाया जा रहा हैं। प्रत्येक बिहु खेती कैलेंडर में एक विशिष्ट चरण के साथ मेल खाता हैं। सबसे महत्वपूर्ण और तीन बिहू उत्सव में सब्से रंगीन हैं वसंत महोत्सव "बोहाग बिहू" या रोंगाली बिहू जो कि अप्रैल के मध्य में मनाया जाता हैं। यह उत्सब कृषि सीज़न की शुरुआत को भी दर्शाता हैं। बिहु असम कि सभी भागो में और सभी जाति-जनजाति और धर्म के लोगो द्वारा मनाया जाता हैं। प्रत्यक्षतया यह कहा जा सकता हैं कि बिहु एक धर्मनिरपेक्ष त्योहार हैं जो भीन्न जाति और धर्म के बीच मानवता, शांति और भाईचारा लाता हैं। बिहू में ताल, पेपा (भैंस के सींग से बना एक वाद्य यंत्र) टोका, बाँहि (बांसुरी), क्शुतुली ,गोगोना आदि वाध्य यन्त्र बजाये जाते है|

बिहू नाम के तीन त्योहार
एक वर्ष में यह त्योहार तीन बार मनाते हैं। पहला सर्दियों के मौसम में पौष संक्रांति के दिन, दूसरा विषुव संक्राति के दिन और तीसरा कार्तिक माह में मनाया जाता है। पौष माह या संक्राति को भोगाली बिहू, विषुव संक्रांति को रोंगाली बिहू और कार्तिक माह में कोंगाली बिहू मनाया जाता है।

भोगाली बिहू :पौष माह या संक्राति को भोगाली बिहू मनाते हैं, जो कि जनवरी माह के मध्य में अर्थात मकर संक्रांति के आसपास आता है। इस माघ को बिहू या संक्रांति भी कहते हैं।भोगाली बिहू पौष संक्रांति के दिन अर्थात मकर संक्रांति के दिन या आसपास आता है। इसे भोगाली इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इसमें भोग का महत्व है अर्थात इस दौरान खान-पान धूमधाम से होता है और तरह-तरह की खाद्य सामग्री बनाई और खिलाई जाती है।

भोगाली या माघ बिहू के पहले दिन को उरुका कहते हैं। इस दिन लोग खुली जगह में धान की पुआल से अस्थायी छावनी बनाते हैं जिसे भेलाघर कहते हैं। इस छावनी के पास ही 4 बांस लगाकर उस पर पुआल एवं लकड़ी से ऊंचे गुम्बज जैसे का निर्माण करते हैं जिसे मेजी कहते हैं। गांव के सभी लोग यहां रात्रिभोज करते हैं।अम्बुबाशी मेला, परशुराम मेला, दोल जात्रा मेला, अशोकष्टमी मेला असम के प्रसिद्ध मेले है| उरुका के दूसरे दिन स्नान करके मेजी जलाकर बिहू का शुभारंभ किया जाता है। गांव के सभी लोग इस मेजी के चारों ओर एकत्र होकर भगवान से मंगल की कामना करते हैं।अपनी मनोकामना पूरी करने के लिए लोग विभिन्न वस्तुएं भी मेजी में भेंट चढ़ाते हैं। बिहू उत्सव के दौरान वहां के लोग अपनी खुशी का इजहार करने के लिए लोकनृत्य भी करते हैं।नारियल के लड्डू, तिल पीठा, घिला पीठा, मच्छी पीतिका और बेनगेना खार के अलावा अन्य पारंपरिक पकवान भी बनाए जाते हैं।
    व्यस्त सप्तांत के बाद काफी तोफो के साथ विदा किया गया| गैंडा अपनी तीनो सवारियों को लेकर पुनः नदी किनारे बगीचे में आ  गया | यहाँ से हम शाही सवारी पर बैठ अभ्यारण्य देखने गए| पोबीटोरा वन्य जीव अभ्यारण्य गुवाहाटी से 50 किमी दूर मारीगांव जिले में स्थित है। यह अभ्यारण्य मुख्य रूप से एक सींग वाले गेंडे के लिए जाना जाता है। 30.8 वर्ग किमी में फैले इस अभ्यारण्य में 16 वर्ग किमी में सिर्फ गेंडे रहते हैं। चूंकि यहां बड़ी संख्या में गेंडें हैं, इसलिए ऐसा कहा जाता है कि गेंडे अभ्यारण्य से बाहर भी निकल आते हैं। गेंडें के अलावा इस वन्य जीव अभ्यारण्य की दूसरी विशेषता यहां हर साल आने पर्यटक के लिए  पशु पक्षियों,वनस्पति और गेंडें के अलावा इस वन्य जीव अभ्यारण्य की दूसरी विशेषता यहां हर साल आने वाले प्रवासी पक्षी हैं। यहां हर साल करीब 2000 प्रवासी पक्षियां आते हैं। अभ्यारण्य में एशियाई भैंस, तेंदुआ, जंगली बिल्ली और जंगली भालू सहित कई अन्य जीव भी देखे जा सकते हैं। अक्टूबर से अप्रैल के बीच इस अभ्यारण्य को घूमना सबसे अच्छा रहता है। सड़क मार्ग के जरिए गुवाहाटी से पोबीटोरा वन्य जीव अभ्यारण्य पहुंचने में एक घंटे का समय लगता है। पर्यटकों का एक दल हमारे पास आकर रूका | उन्हों बताया  की सड़क मार्ग से एक घंटे के सफ़र के बबाद ब्रहमपुत्र नदी के पुल को पार कर के मायोंग गाँव पहुंचे है|१६किलोमीटर में केवल गैंडे ही रहते है| भोजन की तलाश में गैंडे नजदीक के गाँव में भी आ जाते है| दो घंटे की यात्रा के बाद हम अपने प्रिय बगीचे में वापिस आ गए| हमें सभी को भूख लग रही थी| बन्दर द्वारा लाया लाल फूल खाने से गैंडा पुनः छोटी आकृति में आ गया| हम चारों उसी बगीचे में मस्ती कर रहे थे| अचानक एक तितली वहां पर आ गई |और वह अनवी के बालों में बैठ गई| तितली के बैठते ही अनवी अद्रश्य हो गई| बन्दर यह सब देख रह था | उसने बिना समय गंवाए तितली को पकड लिया| तितली के अनवी के ऊपर से हटते ही अनवी फिर से दिखाई देने लगी| ज्यों ही बन्दर तितली को अपने मुहं में डालने लगा वह चिल्लाई मुझे छोड़ दो में फिर से एसी गलती नहीं करूंगी | अनवी सब से पूछने लगी क्या बात है क्या हुआ? इस पर तितली ही बताने लगी की में जिस प्राणी पर बैठ जाती हूँ ना तो वह और नहीं मैं किसी को दिखाई देते है| अनवी को यह काफी अच्छा लगा| उसने तितली को अपने हाथ में लिया और प्यार से तितली को देखने लगी| बन्दर ने कहा अब तितली को छोड़ दो| तितली को छोड़ देने से अनवी पुनः दिखाई देने लगी| अब तितली भी उनके समूह में शामिल हो गई | काफी दिन यों ही सैर सपाटे में बीत गया|एक दिन अचानक अनवी को घर की याद आ गई और वह उदास हो गई और रोने लगी|दोस्तों ने अनवी के रोने का कारन पूछा तो उसने बताया की वह घर जाना चाहती है| चरों दोस्त अनवी को मानाने में लगे हुए थे तभी अनवी की आँख से आंसू उसके पास रखी गुडिया पर गिर गए | आंसू गिरते ही गुडिया जोर जोर से हंसाने लगी| अचानक हंसने की आवाज से सभी चोक गए|  बन्दर ने गुडिया को अपने हाथ में उठाया| वह गुड़ियाँ जादू की गुडिया थी| बन्दर ने गुडिया का हाथ मरोड़ा तो वह रोने लगी और कहने लगी-मैं रस्ते में पारी हुई थी| सारे बच्चे आगे निकल गए परन्तु अनवी ने मुझे उठा लिया|तभी से में इस के साथ घूम रही हूँ|मुझ पर काला जादू कर के रास्ते में डाला गया था|मेरे जादू से असर से आप सभी पर कोई विपत्ति नहीं आई| यदि मेरे गले में बंधा काला धागा कोई तोड़ दे तो में जादू से मुक्त हो जाऊंगी |धागा पुनः बांधने से में फिर सर जादुमइ हो जाऊंगी| बन्दर ने झट से व कला धागा तोड़ दिया और अनवी को धागा दे दिया|अब गुडिया एक साधारण गुडिया रह गई थी|
    सारे दोस्त बैठे बैठे एक दुसरे को अपनी अपनी कहानी बता रहे थे| अबे से पहले गैंडे ने बताया – दिखने को तो में गैंडा हूँ परन्तु मैं भी इन्सान हूँ | एक जादूगर ने अभिमंत्रित कर के एक लोहे की कील रस्ते में गाड दी ताकि वहां से गुजरने वाले किसी भी हिंसक जानवर के पैर में लगे और जादूगर उस को वश में कर सके| दुर्भाग्य से वह कील मेरे पैर में लगी और अब में पूर्ण रूप से उसके काबू में हूँ|  मन्त्रों सर उसने मेरी सीमा को बांध रखा है| में इस से बाहर नहीं जा सकता हूँ| में इंसान से पालतू गैंडा बन गया हूँ| यदि मेरे पैर से यह कील निकल दी जाये तो में पुनः इंसान बन जाऊँगा | अनवी ने गैंडे के पैर से कील निकल दी और वह गैंडे से इंसान बन गया|उस आदमी ने बताया की में पूरी तरह जादू के प्रभाव से मुक्त नहीं हुआ हूँ| यदि तुम यह कील फिर से जमीन में गाड दो गी तो में तुम्हारे पास गैंडा बनकर ही आ जाऊँगा| अनवी ने उस कील ओ अपने पास रखा और उसको अलविदा कहा|
    अब लाल चिड़िया ने अपनी कहानी सुनानी आरम्भ की | वह कहने लगी – मायोंग गाँव में मै अपने पति के साथ रह रही थी| मेरा नाम शुबाँगी है| मेरी पडोसन ने मेरे पति को मेंढा बना कर अपने घर में बांध लिया| रात को उसको आदमी बना कर अपने पास रखती और घर व खेत का सारा काम करवाती| कई सालों तक में अपने पति को तलाश करती रही| साद साल बाद मुझे एक अघोरी बाबा ने सारा रहस्य बताया| बदले की आग में मैंने अघोरी बाबा से साधना सीखी और अपने पति को मुक्त करवाना चाहा| परन्तु बाबा के कहने पर मैंने अपनी कला का उपयोग जन कल्याण में लगाना आरम्भ कर दिया|अब में अपनी इच्छा अनुसार जवान लड़की या लाल चिड़िया बन सकती हूँ| में अपना आकर अपनी इच्छा अनुसार छोटा या बड़ा कर सकती हूँ|

    सुनहरे लंगूर जिसे हम यहाँ बन्दर कह रहे है ने अपनी कहानी बतानी आरम्भ की – मै कामख्या मंदिर के पास नदी के टापू में अपने परिवार के साथ रहता था| एक दिन अम्बुवाची पर्व के दोरान एक अघोरी अपनी साधना में लीन था| मैने शरारत वश उसकी हवन सामग्री उठा कर ब्रहमपुत्र नदी में डाल दी| अघोरी ने मुझे तंत्र विद्या से इस अभ्यारण तक सीमित कर दिया| मेरे परिवार के विलाप करने पर उसने कहा की एक लड़की के साथ रहने पर वह तुम्हारे साथ उमानंद मंदिर में आएगी और तुम्हे यहीं छोड़ जायेगी| इसके बाद तुम पुनः यहाँ रह ने लगोगे|

    अब लाल तितली अपनी कहानी सुनाने लगी- में एक सुंदर लड़की थी| बिहू नृत्य के दोरान एक लड़के से प्यार करने लगी| परन्तु वह लड़का किसी और लड़की से प्यार करता था| वह लड़की काला जादू जानती थी| उसने मुझे जादू से तितली बना दिया| एक अघोरी की कृपा से में अदृश्य होने का जादू जानती हूँ | में पुनः लड़की भी बन सकती हूँ परन्तु मायोंग की सीमा से बहार|

अब बन्दर ने लाल चिड़िया को एक लाल मच्छली दी जिससे उसका आकर एक हाथी जितना हो गया| अनवी उस पर बैठ गई| चिड़िया ने पल झपकते ही उसे अनवी के घर के पास वाले बगीचे में उतार दिया|घर के दरवाजे पर पहुँचते ही अनवी का मिन्नी ने अपना  पुन्छ हिला कर स्वागत किया| उसके विद्यालय वाले और अनवी के पापा अनवी को गुवाहटी में तलाश कर रहे थे| अनवी के सहपाठी और मैडम पिछले सप्ताह ही गुरुग्राम पहुँच चुके थे|अनवी ने घर की छत पर खड़े हो कर लाल चिड़िया को बिदाई दी| लाल चिड़िया अब अपने सामान्य आकार में आ चुकी थी|अनवी को उसके घर छोड़ चिड़िया पुनः पोबितोरा के बाग़ में पहुच चुकी थी|

    अनवी अपनी पाठशाला में काफी चर्चा में थी| जब वह अपनी कक्षा में आई तो साथियों के कई सवालों के जबाब देने पड़े|एक ने पूछा अनवी कहा खो गई थी? अनवी ने कहा अरे में खोई थोड़े ही थी , में तो अपने नए दोस्तों के साथ गहन जंगल की सैर कर रही थी| वहाँ पर एक लाल चिड़िया,एक सुनहरे रंग का लंगूर, एक गैंडा और एक तितली मेरे दोस्त बन गए थे|सारे विद्यार्थी अनवी की कहानी अनवी की जुबानी सुन रहे थे| सारे विद्यार्थी अनवी को घेरे खड़े थे, अचानक कमरे में मैडम आई और कहने लगी ये क्या हो रह है| मैडम की आवाज सुन कर सभी विद्यार्थी अपनी अपनी जगह पर बैठ गये |मैडम ने अनवी को अपने पास बुलाया और एक सप्ताह की पूरी कहानी कक्षा में बताने को कहा|अनवी ने अपना सारा वृतांत कह सुनाया |कक्षा के सामने अपनी कहानी सुना कर अनवी गर्वित महसूस कर रही थी| मैडम ने मज़ाक में पूछा अनवी अब मायोंग कब जा रही हो?अनवी ने कहा मैडम जल्दी ही जाना पड़ेगा,साथियों की बहुत याद आ रही है| वे भी मुझे याद कर रहे है|अनवी अब पशु पक्षियों की आवाज समझ सकती थी|इतने में उसे खिड़की में लाल चिड़िया दिखाई दी| वह उसको कक्षा के बाहर बुला रही थी| कक्षा में बात करते करते उसने चिड़िया को कहा ठहरो अभी कक्षा ख़तम होने पर आउंगी| मैडम ने खिड़की की और देखा और पूछा कौन है? तुम्हे कौन बुला रहा है? बाहर तो कोई नहीं है| अनवी ने कहा मैडम दरवाजे पर कोई नहीं है| इस खिड़की में देखो यह लाल चिड़िया पोबीटोरा वन्य जीव अभ्यारण्य से यहाँ मुझे बुलाने आई है|इसने ही मुझे यहाँ तक पहुँचाया था|अनवी की बात सुन कर सारी कक्षा हंसने लगी| यह चिड़िया अपनी इच्छा अनुसार आकर में बड़ी छोटी हो सकती है| इसने मुझे अपने ऊपर बैठा कर केवल दो घंटे में यहाँ पहुंचा दिया था| सारे विद्यार्थी अनवी की बातों पर आश्चर्य कर रहे थे|अनवी ने कहा अब आगामी छुट्टियों में मेरा फिर से जाने का कार्यक्रम है |यह लाल चिड़िया मुझे फिर से वहा ले जायेगी| आप सभी लोग मुझे खिड़की से देखना यह चिड़िया मुझे बैठा कर ले जायेगी |अनवी छत पर गई और लाल चिड़िया उसे लेकर उड़ गई| कक्षा के बच्चे खिड़की से उसे जाता देख रहे थे| और अनवी को हाथ हिला कर अलविदा कर रहे थे|


Tuesday, 28 August 2018

एक रात एक बात

मायोंग

की माया



 

                

प्राकथन

    बाल साहित्य और चौपाल की कहानिया मुझे आज भी कहानिया पढ़ने और सुनाने को प्रेरित करते है| आप सब की तरह मैंने भी कहानियों का रसस्वादन किया है| मैंने भी भारतीय और अन्तरास्ट्रिये साहित्य से कहानिया पढ़ी है| मै गुलिवर की यात्राये,अरेबियेन नाईटस,राजा विक्रमाद्त्य और सिंहासन बत्तीसी की कहानियाँ, परियों की कहानियों से काफी प्रभावित हुआ हूँ|कहानियाँ अति कल्पनाशील, तिलस्मी तथा जादुई घटनाओं से भरी हुई हैं। बाल साहित्य परी कथाओं , जादू टोने और कल्पना शील घटनाओं से भरा हुआ है| इससे प्रभावित हो कर मैंने यह किताब लिखने का निर्णय लिया |

     मेरी नौकरी के दौरान मुझे आसाम जाने का मौका मिला | मेरे काम की प्रकृति ऐसी थी की मुझे गाँव गाँव और जंगल जंगल घूमने का मौका मिला | सेना में होने के कारण पूरी सुरक्षा के साथ जाना पड़ता था | इसका लाभ और हानि दोनों ही थे |असामी  संस्कृति , रीति रिवाज और सभ्यता को समझने का मौका मिला | सौभाग्य से मेरा निवास ब्रह्म पुत्र नदी के किनारे पर ही था | हरियाणे की तुलना में असम काफी हरा भरा प्रदेश है | सदाबहार मौसम मेरे जैसे घुमकड़ के लिए अधिक अनुकूल रहता है | इस पुस्तक में मै असम के वन्य जीवन और वनस्पतियों से परिचय के साथ साथ असामी  संस्कृति , रीति रिवाज और सभ्यता से भी परिचय करवाऊंगा| नदियों और ऊँचे नीचे पहाड़ों के मध्ये खूबसूरत परिदृश्य मन को मोहित करते है और रास्ते की थकान को भुला देते है| इन सब से जुडी कहानियां मन की जिज्ञासा को बढ़ा देती है | देवी कामाख्या मंदिर , कामरूप और मायोंग से जुडी जादुई कहानियों ने मुझे यह पुस्तक लिखने को प्रेरित किया है| इस पुस्तक में गुरुग्राम के एक निजी विद्यालय की छात्रों का समुह असम के भ्रमण के लिए जाता है| आरम्भ में वह दल पोबित्रो वन्य प्राणी उद्यान देखने जाता है |वहां पर एक लड़की जिसका नाम अनवी है को एक जादुई गुड़ियाँ मिल जाती है | प्रस्तूत पुस्तक में अनवी इन सभी राष्ट्रीय उद्यान और वन्य प्राणी उद्यान का भ्रमण करती है| हर बार उसके साथ जादुई करिश्मा होता है | हर बार यह जादुई गुडिया उसे बचा लाती है |यात्रा का सफ़र मायोंग गाँव से होता है जो जादू के लिए विश्व प्रसीद्ध है | विभिन्न राष्ट्रीय उद्यानों और वन्य प्राणी उद्यानों में कैसे जाए ,वहां क्या देखे , जादू और चमत्कार से भरी कहानियाँ आपको पढ़ने को मिलेगी |

       राष्ट्रीय उद्यान

1. काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान

2. मानस राष्ट्रीय उद्यान

3. नमेरी राष्ट्रीय उद्यान

4. डिब्रू-सैखोवा राष्ट्रीय उद्यान

5. औरंग राष्ट्रीय उद्यान

6. देहिंग पत्कई राष्ट्रीय उद्यान

      वन्य प्राणी उद्यान

7. हूल्लोंगापर वन्य प्राणी उद्यान

8. गरमपानी वन्य प्राणी उद्यान

9. बूरा चपोरी वन्य प्राणी उद्यान

10. बोरनाडी वन्य प्राणी उद्यान

11. सोनई रुपाई वन्य प्राणी उद्यान

12. पोबीटोरा वन्य प्राणी उद्यान

13. पाणीदिहिंग पक्षी विहार

14. भेरजन-बोरजन-पदुमोनी वन्य प्राणी उद्यान

15. नाम्बोर वन्य प्राणी उद्यान

16. पूर्वी कर्बी-आंगलोंग वन्य प्राणी उद्यान

17.लओखोवा वन्य प्राणी उद्यान

18.लओखोवा वन्य प्राणी उद्यान

19. मारत लोंगरी वन्य प्राणी उद्यान 

20. नाम्बोर-दोइग्रुन्ग वन्य प्राणी उद्यान

21. चक्रशिला वन्य प्राणी उद्यान

22. बोरेल वन्य प्राणी उद्यान

23. अम्संग वन्य प्राणी उद्यान

24.डिपोर बिल वन्य प्राणी उद्यान

   प्रस्तावित वन्य प्राणी उद्यान

25. उत्तर कर्बी-आंगलोंग वन्य प्राणी उद्यान

26. बोर्दोइबम बिल्मुख पक्षी वन्य प्राणी उद्यान

     अन्य

27. कामख्या

28. मायोंग गाँव

29. मंजुलिका द्वीप

30. धुबरी

        

 

 

लेखक का परिचय

 

     वैसे तो सेवानिवृति के बाद मेरे पास  समय ही समय रहता था | परन्तु करोना और उसके बाद लोक डाउन ने तो समय काटना मुसकिल कर दिया था| में भारतीय सेना, भारतीय व्यापार प्राधिकरण (अब भारतीय व्यापार संवर्धन संगठन) और बैंक की चालीस साल की सेवा के बाद सेवा निवृत हुआ था | और इस को भी लगभग चार साल हो चुके थे| सेवा निवृति के कुछ साल तो घर गृहस्थ के साथ और शोक पूरा करने में  आराम से बीते| बच्चों को रोज कहानी सुनाना एक दिनचर्या का हिस्सा बन चुका था | परन्तु करोना और लोक डाउन ने सब को दूर कर दिया| इस ऊबाऊ पन  को दूर करने और अपने सुनहरे पल के मधुर संस्मरण बाटने के लिए यह पुस्तक आप सभी को समर्पित है|

     प्रस्तुत पुस्तक में जादू टोने के सहारे पेड़ पौधों से प्यार और वन्य प्राणियों को समझने और असम की संस्कृति से परिचय करवाने का प्रयास किया गया है | झाड़ फूक से सचेत करने का एक छोटा सा कदम है |

 

                                    लेखक

 

 

 

 

मेरी पहली यात्रा

 

एक परिचय

 

कामाख्या

     कामरूप का नाम आते ही कामाख्या देवी के मंदिर का ध्यान अवश्य आत़ा है | यह 51 शक्ति पीठों में से एक है | यह तांत्रिक देवी हैं और काली तथा 'त्रिपुर सुन्दरी' के साथ इनका निकट समबन्ध है। इनकी कथा का उल्लेख कालिका पुराण और योगिनी तंत्र में विस्तृत रूप से हुआ है। समूचे असम और पूर्वोत्तर बंगाल में शक्ति अथवा कामाक्षी की पूजा का बड़ा महात्म्य है। असम के कामरूप में कामाख्या का प्रसिद्ध मन्दिर अवस्थित है।

        पश्चिमी भारत में जो कामरूप की नारी शक्ति के अनेक अलौकिक चमत्कारों की बात लोकसाहित्य में कही गई है, उसका आधार इस कामाक्षी का महत्व ही है। 'कामरूप' का अर्थ ही है 'इच्छानुसार रूप धारण कर लेना' और विश्वास है कि असम की नारियाँ चाहे जिसको अपनी इच्छा के अनुकूल रूप में बदल देती थीं। विश्व के सबसे प्राचीनतम तंत्र आगम मठ के अनुसार कामाख्या मे आज भी तंत्र की ऐसी शाखायें है जिनके अनुसार कुछ भी पाया जा सकता है परंतु बहुत ही कठिन है|

     पुराणों के अनुसार पिता दक्ष के यज्ञ में पति शिव का अपमान होने के कारण सती हवनकुंड में ही कूद पड़ी थीं जिसके शरीर को शिव कंधे पर दीर्घकाल तक डाले फिरते रहे। सती के अंग जहाँ-जहाँ गिरे वहाँ-वहाँ शक्तिपीठ बन गए जो शाक्त तथा शैव भक्तों के परम तीर्थ हुए। इन्हीं पीठों में से एककामरूप असम में स्थापित हुआ, जो आज की गौहाटी के सामने 'कामाख्या' नामक पहाड़ी पर स्थित है।

     असम के पूर्वी भाग में अत्यंत प्राचीन काल से नारी की शक्ति की अर्चना हुई है। महाभारत में उस दिशा के स्त्रीराज्य का उल्लेख हुआ है। इसमें संदेह नहीं कि मातृसत्तात्मक परंपरा का कोई न कोई रूप वहाँ था जो वहाँ की नागा आदि जातियों में आज भी बना है। ऐसे वातावरण में देवी का महत्व चिरस्थायी होना स्वाभाविक ही था और जब उसे शिव की पत्नी मान लिया गया तब शक्ति संप्रदाय को सहज ही शैव शक्ति की पृष्ठभूमि और मर्यादा प्राप्त हो गई। फिर जब वज्रयानी प्रज्ञापारमिता और शक्ति एक कर दी गईं तब तो शक्ति गौरव का और भी प्रसार हो गया। उस शक्ति विश्वास का केंद्र गोहाटी की कामाख्या पहाड़ी का यह कामाक्षी पीठ है। सती स्वरूप्नी आद्ध्य शक्ती की मा भैरवी कामाख्या का मंदिर  विश्व का सर्वोच्च कौमारी तीर्थ भी माना जाता है |यहाँ पर कौमारी पूजा अनुष्ठान का बी महत्व है |यहाँ पर सभी वर्णों और जातियों की कुमारियाँ वन्दनिये और पूजनिये है| यहाँ पर वर्ण भेद करने पर साधक की सारी शक्तियां ख़तम हो जाती है| यहाँ मनाये जाने वाले अम्बुवाची पर्व का विशेष महत्त्व है |इस पर्व के दोरान साधक अपनी दिव्य और आलोकिक शक्त्यों के अर्जन और पुनः संचरण के लिए अनुष्ठान करते है |

          मा भगवती के रजस्वला होने से पूर्व गर्भ गृह में स्थित महा मुद्रा पर सफ़ेद वस्त्र चढ़ाये  जाते है, जो रक्त वर्ण हो जाते है | मंदिर के पुजारी ये  वस्त्र ही भक्तों को प्रशाद स्वरुप वितरित करते है | इस दोरान यहाँ पर बंगला देश,तिब्बत ,नेपाल और अफ़्रीकी देशों से तंत्र साधक यहाँ अपनी साधना के सर्वोच्च शिखर को प्राप्त करते है| वाम मार्ग साधकों का यह सवोच्च पीठ है|मच्चंदर नाथ,गोरख नाथ , लोना चमारी और इस्माइल जोगी आदि तंत्र साधक सांवर तंत्र में अपना स्थान बना कर अमर हुए है| अम्बुवाची पर्व साल में एक बार मनाया जाता है |शास्त्रों के अनुसार यह पर्व सतयुग में 16 साल में, द्वापर में 12 साल में और त्रेता युग मे 7 वर्ष में एक बार आत़ा है| यह जून माह में आत़ा है| इस दोरान मा भगवती के कपाट बंद हो जाते है और उनके दर्शन निषेध हो जाते है |

     यहीं भगवती की महामुद्रा (योनि-कुण्ड) स्थित है। देश भर मे अनेकों सिद्ध स्थान है जहाँ माता सुक्ष्म स्वरूप मे निवास करती है प्रमुख महाशक्तिपीठों मे माता कामाख्या का यह मंदिर सुशोभित है हिंगलाज की भवानी, कांगड़ा की ज्वालामुखी, सहारनपुर की शाकम्भरी देवी, विन्ध्याचल की विन्ध्यावासिनी देवी आदि महान शक्तिपीठ श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र एवं तंत्र- मंत्र, योग-साधना के सिद्ध स्थान है। यहाँ मान्यता है, कि जो भी बाहर से आये भक्तगण जीवन में तीन बार दर्शन कर लेते हैं उनके सांसारिक भव बंधन से मुक्ति मिल जाती है । " या देवी सर्व भूतेषू मातृ रूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:

 

     इस बारे में कहा जाता है  कि अम्बूवाची योग पर्व के दौरान मां भगवती के गर्भगृह के कपाट स्वत ही बंद हो जाते हैं और उनका दर्शन भी निषेध हो जाता है। इस पर्व की महत्ता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पूरे विश्व से इस पर्व में तंत्र-मंत्र-यंत्र साधना हेतु सभी प्रकार की सिद्धियाँ एवं मंत्रों के पुरश्चरण हेतु उच्च कोटियों के तांत्रिकों-मांत्रिकों, अघोरियों का बड़ा जमघट लगा रहता है। तीन दिनों के उपरांत मां भगवती की रजस्वला समाप्ति पर उनकी विशेष पूजा एवं साधना की जाती है।

     कामाख्या के बारे में किंवदंती है कि घमंड में चूर असुरराज नरकासुर एक दिन मां भगवती कामाख्या को अपनी पत्नी के रूप में पाने का दुराग्रह कर बैठा था। कामाख्या महामाया ने नरकासुर की मृत्यु को निकट मानकर उससे कहा कि यदि तुम इसी रात में नील पर्वत पर चारों तरफ पत्थरों के चार सोपान पथों का निर्माण कर दो एवं कामाख्या मंदिर के साथ एक विश्राम-गृह बनवा दो, तो मैं तुम्हारी इच्छानुसार पत्नी बन जाऊँगी और यदि तुम ऐसा न कर पाये तो तुम्हारी मौत निश्चित है। गर्व में चूर असुर ने पथों के चारों सोपान प्रभात होने से पूर्व पूर्ण कर दिये और विश्राम कक्ष का निर्माण कर ही रहा था कि महामाया के एक मायावी कुक्कुट (मुर्गे) द्वारा रात्रि समाप्ति की सूचना दी गयी, जिससे नरकासुर ने क्रोधित होकर मुर्गे का पीछा किया और ब्रह्मपुत्र के दूसरे छोर पर जाकर उसका वध कर डाला। यह स्थान आज भी `कुक्टाचकि' के नाम से विख्यात है। बाद में मां भगवती की माया से भगवान विष्णु ने नरकासुर असुर का वध कर दिया। नरकासुर की मृत्यु के बाद उसका पुत्र भगदत्त कामरूप का राजा बना। भगदत्त का वंश लुप्त हो जाने से कामरूप राज्य छोटे-छोटे भागों में बंट गया और सामंत राजा कामरूप पर अपना शासन करने लगा।  नरकासुर के नीच कार्यों के बाद एवं विशिष्ट मुनि के अभिशाप से देवी अप्रकट हो गयी थीं और कामदेव द्वारा प्रतिष्ठित कामाख्या मंदिर ध्वंसप्राय हो गया था।

     आदि-शक्ति महाभैरवी कामाख्या के दर्शन से पूर्व महाभैरव उमानंद, जो कि गुवाहाटी शहर के निकट ब्रह्मपुत्र 'नदी ' के मध्य भाग में टापू के ऊपर स्थित है, का दर्शन करना आवश्यक है। यह एक प्राकृतिक शैलदीप है, जो तंत्र का सर्वोच्च सिद्ध सती का शक्तिपीठ है। इस टापू को मध्यांचल पर्वत के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि यहीं पर समाधिस्थ सदाशिव को कामदेव ने कामबाण मारकर आहत किया था और समाधि से जाग्रत होने पर सदाशिव ने उसे भस्म कर दिया था। भगवती के महातीर्थ (योनिमुद्रा) नीलांचल पर्वत पर ही कामदेव को पुन जीवनदान मिला था। इसीलिए यह क्षेत्र कामरूप के नाम से भी जाना जाता है।

     कामाख्या मंदिर के दर्शन का समय भक्तों के लिए सुबह 8:00 बजे से दोपहर 1:00 बजे तक और फिर दोपहर 2:30 बजे से शाम 5:30 बजे तक शुरू होता है। सामान्य प्रवेश नि: शुल्क है, लेकिन भक्त सुबह 5 बजे से कतार बनाना शुरू कर देते हैं, इसलिए यदि किसी के पास समय है तो इस विकल्प पर जा सकते हैं। आम तौर पर इसमें 3-4 घंटे लगते हैं। वीआईपी प्रवेश की एक टिकट लागत है, जिसे मंदिर में प्रवेश करने के लिए भुगतान करना पड़ता है, जो कि प्रति व्यक्ति रुपए 501 की लागत पर उपलब्ध है। इस टिकट से कोई भी सीधे मुख्य गर्भगृह में प्रवेश कर सकता है और 10 मिनट के भीतर पवित्र दर्शन कर सकता है| यहाँ पर माँ काली के दस रूप धूमावती, मातंगी, बगोला, तारा, कमला, भैरंवी, चिन्मासा, त्रिपुरा सुंदरी और भुवनेश्वरी के दर्शन कर सकते है |

     जब काम देव ने अपना पुरुषत्व खो दिया था तो यहीं पट ताप करने पर पुनः अपना पुरुषत्व  प्राप्त हुआ था |

     यहाँ की भूमि ऊँची नीची है जिसको असम कहते है| इस लिए इस प्रदेश का नाम असम पड़ गया| प्राचीन भारतीय ग्रंथों में इस का नाम प्रागज्योतिष है | श्री कृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध ने यहाँ की युवती उषा पर मोहित हो कर उसका अपहरण किया था |भगवत पुराण के अनुसार उषा ने अपनी सखी चित्रलेखा द्वारा अनिरुध का अपहरण करवाया था| प्राचीन असम को कामरूप के नाम से जाना जाता है | ब्रह्मपुत्र यहाँ की प्रमुख नदी है | तिब्बत में इसको सान्गापी कहते है | इसमें कई टापू भी बनते है |मान्जुली द्वीप 929 किलोमीटर में फैला है जो विश्व का नदी का सबसे बड़ा द्वीप है | ब्रह्मपुत्र की 35 सहायक नदियाँ है | असम में केवल प्राकृतिक सौन्द्र्य ही नहीं यहाँ की संस्कृति भी उत्कृष्ट है |बिहू यहाँ की गौरवमयी परम्परा है |माघ महीने में सक्रांति से एक दिन पहले भोगाली बिहू मनाया जाता है |तिल, चावल, नारियल और गन्ने की भरपूर फसल होती है|इससे तरह तरह की खाद्य सामग्री तैयार की जाती है| अतः ऐसे भोगाली बिहू कहते है|

     असमिया कलेंडर बैशाख महीने से आरम्भ होता है |इस मास में मनाये जाने वाले बिहू को बैशाख बिहू कहते है |सात दिन चलने वाला बिहू अलग अलग रिती रिवाजों से मनाया जाता है |इस बिहू को बोहाग बिहू कहते है |प्रथम दिन गाय की पूजा की जाती है सभी अपनी अपनी गायों को नदी या पोखर में रात को भिगो कर रखी कलई दाल,कच्ची हल्दी से स्नान करवाते है | इस के बाद वहीँ पर गायों को लौकी बैगन आदि खिलाया जाता है | सायकाल गाय को नई रस्सी से बांधा जाता है | मान्यता है की ऐसा करने से गाय साल भर कुशक पूर्वक रहती है |ओषधिये पेड़ पौधे जला कर मच्छरों को भगाया जाता है| इस दिन चावल खाने निषेध है |पहले बैशाख में आदमी का बिहू शुरू होता है | इस दिन लोग कच्ची हाली लगा कर स्नान करते है और नए वस्त्र पहनते है| पूजा पाठ कर के दही चिवडा और पकवान खाते है | इस दिन से असमिया नया साल आरम्भ होता है| इन सात दिनों में 101 हरी पत्तियों वाली सब्जी खाने का रिवाज है | हर तरफ नई फसल आने की तैयारी होती है |इसी समय वर्षा की पहली बूंद गिरती है और पृथ्वी नए साल में नई तरह से सजाती है |20-25 युवक और युवतियों की टोली ढोल,पपा, गगना,ताल और बांसुरी इत्यादि के साथ अपनर पारम्परिक परिधान में नाचती और गाती है | इस अवसर पर उन्हें अपना मन पसंद जीवन साथी चुनने का मौका मिलता है और अपने नए जीवन साथी के साथ नई जिन्दगी का आरम्भ करते है| यही कारण है की असम में ज्यादातर विवाह बैशाख मास में सम्पन्न हो जाते है |गांवों में खेल तमाशों का आयोजन किया जाता है |

     काति बिहू  या कंगाली बिहू कार्तिक महीने में मनाया जाता है | धान की फसल में दाने आने शुरू हो जाते है | इन को कीड़ो से बचाने के लिए यह बिहू मनाया जाता है | आँगन में तुलसी का पोधा लगा कर दिया जलाया जाता है और भगवान् से प्रार्थना की जाती है की फसल ठीक ठाक रहे |

     असम में 27 जिले हैयहाँ की आबादी पर भी आधुनिकता की छाप पड़ी है| महिलाए पुरुषों से अलग तरह की पोशाक पहनती है | कमर से ऊपर के हिस्से पर एक विशेष प्रकार की चद्दर पहनी जाती है और कमर से नीचे मेखला पहनते है| पुरुष गामोशा पहनते है | असम की दो भाग वाली साडी को मेखला चादर कहते है |इस को ब्लाउज के साथ पहना जाता है |

पोबितोरा वन्य प्राणी अभयारण्य

 

      भारत के असम राज्य के मरिगाँव ज़िले में ब्रह्मपुत्र नदी के दक्षिणी तट पर विस्तारित एक 38.85 वर्ग किमी बड़ा एक वन्य अभयारण्य है। यह भारतीय गैण्डे के लिए संरक्षित एक घास भूमीय व आर्द्रभूमिय क्षेत्र है। इसे सन् 1987 में स्थापित करा गया था।

     इस  अभयारण्य के मात्र 16 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र 90 से ज़्यादा गैंडों का आवास स्थल है। गौरतलब है कि इतने कम क्षेत्रफल में 90 से ज़्यादा गैंडों का रहना इस अभयारण्य को दुनिया के उच्चतम जनसंख्या घनत्व वाला अभयारण्य बनाता है।गैंडे के अलावा तेंदुआ, फिशिंग कैट, जंगली बिल्ली, जंगली भैंस, जंगली सुअर, चीनी पैंगोलिन आदि जैसे अन्य स्तनधारी भी यहाँ पाए जाते हैं।सर्दियों में पोबितोरा पक्षियों के लिये स्वर्ग बन जाता है, जिसमें हज़ारों जलप्रपात आर्द्रभूमि को रोमांचित करते हैं।

     पोबितोरा वन्यजीव अभयारण्य का मात्र 16 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र 90 से ज़्यादा गैंडों का आवास स्थल है। गौरतलब है कि इतने कम क्षेत्रफल में 90 से ज़्यादा गैंडों का रहना इस अभयारण्य को दुनिया के उच्चतम जनसंख्या घनत्व वाला अभयारण्य बनाता है।

गैंडे के अलावा तेंदुआ, फिशिंग कैट, जंगली बिल्ली, जंगली भैंस, जंगली सुअर, चीनी पैंगोलिन आदि जैसे अन्य स्तनधारी भी यहाँ पाए जाते हैं।

     सर्दियों में पोबितोरा पक्षियों के लिये स्वर्ग बन जाता है, जिसमें हज़ारों जलप्रपात आर्द्रभूमि को रोमांचित करते हैं।पोबितोरा को तीन अलग-अलग श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है: वन, घास का मैदान और जल निकाय।

      गुरुग्राम के एक निजी विद्यालय की छात्रों का समूह छुट्टियों में असम भ्रमण के लिए गया | भ्रमण के दौरान गाइड पूरे दल को वनस्पति और पशु पक्षियों के बारे में बता रहा था | सभी विद्यार्थी तन्मयता से उस की बात सुन रहे थे |एक लड़की समूह से पीछे रह गयी | उसे रास्ते में एक कपडे से बनी हुई गुड़ियाँ मिल गयी | उस लड़की का नाम अनवी था | अनवी ने गुडिया को चुपके से उठाया और अपनी जेब में छुपा कर रख लिया| अनवी एक बहादुर लड़की थी| सभी बच्चे उत्सुकता से पोबितोरा वन्य अभयारण्य  का भ्रमण कर रहे थे |

     वहां बच्चों ने हाथियों की सवारी का आनंद लिया | तरह तरह के पक्षी देखे | अनवी रंग बिरंगे पक्षियों का आन्नद ले रही थी |अचानक एक लाल छोटी सी चिड़िया उसके ऊपर आ कर बैठ गयी |अनवी चिड़िया को अपने ऊपर बैठा देख कर काफी खुश हो रही थी |उसने चिड़िया को अपनी हथेली पर बैठा लिया |अपनी जेब से बिस्कुट निकाल कर उस को खिलने लगी | प्यार से उस पर हाथ फेरने लगी और पूछने लगी भूख लगी है या प्यास ? चिड़िया ने कहा भूख प्यास तो नहीं लगी परन्तु मै तुम्हारी दोस्त बनना चाहती हूँ | चिड़िया को मनुष्य की तरह बात करते देख अनवी चौक गई और झट से उस की दोस्त बन गई | उसे प्यार से पुचकारने लगी | लाल चिड़िया के चक्कर में अनवी अपने साथियों से बिछुड़ गई | वह लाल चिड़िया से ढेर सारी बाते करती रही | जब अनवी को अपना दल कहीं दिखाई नहीं दिया तो वह घबरा कर उदास हो गई | लाल चिड़िया ने उदासी का कारण पूछा तो अनवी ने अपनी समस्या बता दी | लाल चिडीया ने उसे सांत्वना दी और साथ ही घर पहुंचाने का वादा किया | अनवी लाल चिड़िया के साथ चली गई| लाल चिड़िया ने उसे एक पेड़ से फल ला कर दिया | ज्यों ही अनवी ने वह फल खाया वह चिड़िया जितनी ही छोटी हो गई |अब अनवी भी चिड़िया के साथ पेड़ की एक टहनी पर बैठ गई |कुछ समय बाद अनवी का संतुलन बिगड़ गया और वह टहनी से नीचे बह रही नदी में गिर गई |

     नदी में गिरते ही अनवी नीचे और नीचे पानी में जाती जा रही थी |उसे पानी में सांस लेने में कई परेशानी नहीं हो रही थी | नदी तल में जाने पर उसने रंग-बिरंगी मच्छलियों को खेलते देखा तो वह अपनी परेशानी भूल गई और उनके साथ ही खेलने लग गई | अचानक एक लाल मच्छली उसके हाथ पर आ गई | अनवी ने उसे प्यार से पुचकारा तो अनवी अपने वास्तविक रूप में नदी  जल से बाहर आ गई | अब वह नदी तट पर उदास बैठी थी | उसके साथ लाल चिड़िया और लाल मच्छली दोनों में से कोई नहीं था | वह अपनी कक्षा से भी बिछुड़ चुकी थी | उसको रह रह कर अपनी सहेलियों और घरवालों की याद आ रही थी |

      समय बीतने के साथ उसकी मनोदशा भी बिगड़ रही थी | कभी उसे अपने भाई और बहिनों की याद आती और अभी अपने पालतू कुत्ती मिन्नी की याद आती | इतनी दूर बैठे उसको चिंता थी की मिन्नी ने कुछ खाया या नहीं | इसी उहपोह में अनवी विचारों में डूबी हुई थी | अचानक उसको लाल चिड़िया की आवाज़ सुनाई दी | उसने चिड़िया को इधर उधर खोजा परन्तु कहीं दिखाई नहीं दी |चिड़िया एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर फुदक रही थी | नजर पड़ते ही अनवी उसका पीछा करने लगी |

 

     जब अनवी लाल चिड़िया का पीछा कर रही थी तो अचानक उसे एक दरवाजा दिखाई दिया | अनवी उस दरवाजे में प्रवेश कर गई |वह दरवाज एक बड़े कमरे में खुलता था | वहां चार दरवाजे और थे |उन सभी दरवाजों पर ताले लगे हुए थे | अचानक एक छोटी मेज पर एक चाबी पड़ी हुई दिखाई दी | अनवी ने चाबी उठाई और बारी बारी से ताले खोलने का प्रयास किया |कोई ताला नहीं खुला | अंत में एक  छोटा ताला खोलने का प्रयास किया तो वह खुल गया| वह दरवाजा रसोई में खुलता था | रसोई में उसने कुछ खाने का सामान तलाशना आरम्भ किया | रसोई में उसे दूध के अलावा कुछ नहीं मिला | अनवी ने बर्तन का सारा दूध पी लिया | उसे दूध का स्वाद कुछ अलग सा लगा परतु भूख में जो मिल गया खा पी लिया | दूध पीते ही अनवी को नींद आ गई और वहीँ पर लुढ़क गई | जब उस की आँख खुली तो स्वयं को एक सुन्दर बगीचे में पाया| उसके कपडे भी बदले जा चुके थे | उसे ऐसा महसूस हो रहा था की किसी ने उसे स्नान करवा कर नए कपडे पहना दिए हों | अचानक उसे रास्ते में मिली गुड़ियाँ का ख़याल आया  तो वह उसको तलासने लगी | आखिरकार गुडिया उसे के पास ही मिल गई | बगीचे में उसके पास लाल चिड़िया,एक छोटा सा बन्दर और एक सींग वाला छोटा स गैंडा था | गैंडा आकार में एक फुट से भी छोटा था| अनवी गैंडे को आसानी से उठा सकती थी |